MP News: महाशिवरात्रि के 9 दिन पहले से महाकाल करते है दूल्हा सा श्रृंगार, लगाया जाता है हल्दी का लेप
मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि आने के 9 दिन पहले से ही महाकाल का रूप दूल्हे की तरह सजाया जाता है सारी रस्में की जाती है। यहां पर महाशिवरात्रि पर खास तरह की पूजा की जाती है।
- Written By: दीपिका पाल
भगवान शिव का श्रृंगार (सौ.सोशल मीडिया)
Mahashivratri 2025: भगवान शिव की आराधना का दिन यानि महाशिवरात्रि आने में जहां पर कुछ दिन ही शेष बचे है वहीं पर महादेव के मंदिरों में अभी से तैयारियों का दौर जारी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में महाकालेश्वर मंदिर के भगवान महाकाल को हर दिन अलग-अलग रूप में सजाया जा रहा है। यहां पर महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि आने के 9 दिन पहले से ही महाकाल का रूप दूल्हे की तरह सजाया जाता है सारी रस्में की जाती है।
महाशिवरात्रि ऐसा दिन है जब भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह पावन दिन हर शिवभक्तों के लिए बेहद खास होता है।
महाकाल मंदिर में मनाई जाती है शिव नवरात्रि
आपको बताते चलें कि, महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि से पहले शिव नवरात्रि मनाए जाने की परंपरा शुरु होती है। इस परंपरा के दौरान महाशिवरात्रि के 9 दिन पहले से भगवान महाकाल को दूल्हा बनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। वहीं हर दिन के शेड्यूल के अनुसार, सुबह भस्म आरती से लेकर भोग आरती तक भगवान महाकाल के स्नान के दौरान उन्हें हल्दी लगाई जाती है, भगवान महाकाल को दूल्हे के रूप में पूजा जाता है। महाशिवरात्रि से पहले जहां पर कई मंदिरों में छोटी और बड़ी नवरात्रि मनाई जाती है वहीं पर बाबा महाकाल के दरबार में शिव नवरात्रि मनाई जाती है।
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क्या बताते हैं महाकाल मंदिर के पुजारी
यहां पर महाकाल मंदिर के पुजारी आशीष बताते हैं कि,भगवान को दूल्हा बनाया जाता है और माता पार्वती से उनके विवाह की तैयारी होती है तो इस दौरान श्रद्धालु भी विवाह के उत्सव में झूमते हैं. महाकालेश्वर मंदिर में रोज श्रद्धालु मंगल गीत गाते हैं। इसके अलावा एक अन्य पुजारी महेश गुरु बताते हैं कि वैसे तो भगवान महाकाल रोज निरंकार रूप से साकार रूप धारण करते हैं, मगर शिव नवरात्रि के दौरान भगवान महाकाल को वस्त्र पहने जाते हैं। इस खास परंपरा के दौरान भांग, सूखे मेवे और अबीर,कंकू, गुलाल से श्रृंगार किया जाता है. इसके अलावा भगवान को इत्र भी लगाया जाता है। इस प्रकार की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
