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‘जीवित्पुत्रिका व्रत’ में पढ़ें यह कथा, मनोकामनाएं होंगी पूरी

  • By मृणाल पाठक
Updated On: Sep 28, 2021 | 08:30 AM

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-सीमा कुमारी

हर साल आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘जितिया व्रत’ रखा जाता है। यह व्रत छठ व्रत की तरह तीन दिन तक चलता है। इसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। माताएं अपनी संतान के लिए ये व्रत निराहार और निर्जला करती हैं। इस बार ‘जीवित्पुत्रिका व्रत’ का पर्व 28 सितंबर से लेकर 30 सितंबर तक चलेगा। ‘जीवत्पुत्रिका व्रत’ 28 सितंबर को नहाए खाए के साथ आरंभ होगा और 29 सितंबर को पूरे दिन निर्जला उपवास रखा जाएगा। इसके अगले दिन 30 सितंबर को व्रत का पारण होने के साथ ही इस पर्व का समापन किया जाएगा। इस व्रत में जीऊतवाहन की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान व्रत कथा जरूर पढ़ी जाती है।

धार्मिक मान्यता है कि जितिया की व्रत कथा पढ़ने भर से ही धन-धान्य, समृद्धि, संतान प्राप्ति की कामना पूरी होती है। इससे संतान को लंबी आयु का वरदान भी मिलता है।आइए जानें ‘जीवित्पुत्रिका व्रत’ पौराणिक कथा के बारे में –

कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार, नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उस  पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं। दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन, जिस दिन दोनों को व्रत रखना था। उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया। सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर, चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया। 

फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सिया‍रन छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर, कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। 

कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी। उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गई। वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी। जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। 

अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गई। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।

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Published On: Sep 28, 2021 | 08:30 AM

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