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जानिए राजकुमार से बुद्ध बनने की यात्रा, कौन थे भगवान बुद्ध
- Written By: नवभारत डेस्क

सीमा कुमारी
नई दिल्ली: आज 5 मई शुक्रवार को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ (Buddha Purnima 2023) का पावन पर्व है। बुद्ध पूर्णिमा दुनिया भर में बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह शुभ दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान और मृत्यु का प्रतीक है, और बौद्ध संप्रदायों द्वारा बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है।
आज से लगभग अढ़ाई हजार वर्ष पहले जब पृथ्वी पर हिंसा बढ़ गई थी और धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं का वध हो रहा था। तब जीवों की हत्या रोकने के लिए माया देवी के गर्भ से भगवान स्वयं बुद्ध के रूप में अवतरित हुए। उनके पिता का नाम शुद्धोदन था। उनकी राजधानी कपिलवस्तु थी।
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भगवान बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ के जन्म के बाद उनकी माता का देहांत हो गया। सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी विमाता गौतमी देवी ने किया।
ज्योतिषियों के अनुसार, राजकुमार या तो चक्रवर्ती राजा होंगे या विरक्त होकर जगत का कल्याण करेंगे। महाराज शुद्धोदन ज्योतिषियों की इस बात से चिंतित रहते थे। उन्होंने राजकुमार के लिए बहुत बड़ा भवन बनवा दिया था और उस भवन में दुख, रोग और मृत्यु की कोई बात न पहुंचे इसकी कड़ी व्यवस्था कर दी थी।
राजकुमार का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ था। उनके पुत्र का नाम राहुल था। राजकुमार सिद्धार्थ अत्यंत दयालु थे। एक बार उन्होंने पिता से नगर देखने की आज्ञा मांगी। राज्य की ओर से ऐसी व्यवस्था हो गई कि राजकुमार को नगर में कोई दुखद दृश्य न नजर आए लेकिन होनी को कौन रोक सकता है। नगर घूमते समय एक बूढ़ा आदमी सिद्धार्थ को दिखाई पड़ा। इसी प्रकार जब वह दूसरी बार नगर घूमने निकले तो एक रोगी उन्हें मिला। तीसरी बार एक मुर्दा उन्होंने देखा।
इन दृश्यों को देखकर संसार के सब सुखों से उनका मन हट गया। संसार के सुखों से वैराग्य हो जाने पर अमरता की खोज का सिद्धार्थ ने निश्चय कर लिया। एक दिन आधी रात को वह चुपचाप राजभवन से निकल पड़े।
वन में कठोर तप करने लगे। अंत में वह ज्ञान बोध को प्राप्त करके सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध हो गए। जब भारत में घोर अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड, जाति-प्रथा व बलि प्रथा जैसी अनेक अमानवीय कुरीतियां फल-फूल रही थीं समाज की तार्किक शक्ति क्षीण हो गई थी, मानव-मानव में भेद करने वाली जाति व्यवस्था अपनी पराकाष्ठा पर थी, एकता सामंजस्य और मेल-मिलाप का नामोनिशान नहीं था, इन्हीं परिस्थितियों में महामानव बुद्ध का कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर प्रादुर्भाव हुआ। 29 साल की उम्र में ही अपना राजपाट तथा पत्नी और पुत्र राहुल को सोई अवस्था में त्याग कर दुनिया के दुख का कारण ढूंढने संसार में निकल पड़े।
विषम परिस्थितियों को झेलते हुए कठोर आत्मचिंतन के बाद बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने पाया कि दुनिया में दुख हैं और दुख का कारण तीव्र इच्छा और मानसिक लगाव है। दुख से छुटकारा पाया जा सकता है। छुटकारा पाने के लिए इच्छाओं को वश में करना पड़ेगा। उन्होंने अष्टांग मार्ग पर चलने को कहा। उन्होंने कहा कि संसार अनित्य है। जिसकी उत्पत्ति हुई है उसका अंत भी निश्चित है। यही संसार का नियम है।
भारतीय संविधान का आधार बौद्ध धर्म के सिद्धांत समानता, करुणा व भ्रातृत्व पर है जो जाति, धर्म, क्षेत्र व वर्ग के भेद खत्म कर सबको समान न्याय और सत्ता में हिस्सेदारी का अवसर सुनिश्चित करता है। राष्ट्रध्वज में बौद्ध धर्म चक्र और अशोक स्तंभ इसी बौद्ध दर्शन को इंगित करते हैं। इसमें मनुष्य से लेकर जीव-जंतु, पशु-पक्षी के भी स्वतंत्र रूप से जीने की व्यवस्था की गई है।
महात्मा बुद्ध ने तत्कालीन प्रचलित मान्यताओं को तर्क से काटा और दुख निवारण के सारे व्यावहारिक उपाय बताए। उन्होंने अपने शिष्यों को निर्देश दिया कि दुनिया में अज्ञान के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करें। घृणा को प्रेम से, शत्रुता को मैत्री से, हिंसा को करुणा से दूर करें।
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