

Drug Addiction Treatment: कई लोग नशे की लत से परेशान है, वो छोड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में पता नहीं है। नशे की लत को सिर्फ एक बुरी आदत मानकर नजरअंदाज करना समस्या को और बढ़ा सकता है। शराब, तंबाकू या दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल शरीर के साथ-साथ व्यक्ति के व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।
ऐसे लोगों के लिए नशा छोड़ने का निर्णय लेना पहला कदम है। ऐसे में नशा छोड़ने का फैसला लेना पहला कदम होता है, लेकिन इसे पूरी तरह छोड़ने के लिए सही इलाज, काउंसलिंग, फैमिली सपोर्ट और रिहैबिलिटेशन की जरूरत पड़ती है।
भारत में सरकार की डि-एडिक्शन व्यवस्था के तहत नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था कराई जाती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में ड्रग ट्रीटमेंट क्लीनिक और डि-एडिक्शन सेंटर के जरिए उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सबसे पहले व्यक्ति को यह स्वीकार करना जरूरी है कि नशे के इस्तेमाल से उसके जीवन पर असर पड़ रहा है। बार-बार छोड़ने की कोशिश के बावजूद दोबारा नशा करना, परिवार या काम पर असर पड़ना और सेहत का नुकसान होने के बावजूद नशे का सेवन जारी रखने, जैसे लक्षणों पर विशेषज्ञ से बात करनी चाहिए। साथ ही ऐसी इस स्थिति में खुद को दोष देने के बजाय डॉक्टर या एडिक्शन विशेषज्ञ से मदद लेना ज्यादा उपयोगी रहेगा।
डी-एडिक्शन का मतलब केवल नशा बंद कर देना नहीं है। उपचार व्यक्ति की स्थिति और उसके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले नशीले पदार्थों के सेवन के आधार पर अलग हो सकता है। इसमें चिकित्सकीय जांच, जरूरत के अनुसार दवाएं, काउंसलिंग और व्यवहार से जुड़े उपचार शामिल होते हैं। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की मानक उपचार व्यवस्था में शराब पर निर्भरता के लिए भी अलग उपचार उपलब्ध हैं।
यह बात हर व्यक्ति के लिए सटीक नहीं बैठती है। खासकर लंबे समय से शराब या कुछ अन्य नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति में अचानक सेवन बंद करने पर गंभीर लक्षण हो सकते हैं। इसलिए लंबे समय से नशे का सेवन करने वाले व्यक्ति को बिना चिकित्सकीय सलाह के अचानक नशा बंद करने के बजाय डॉक्टर या डी-एडिक्शन सेंटर से संपर्क करना चाहिए।
अगर नशा बंद करने के बाद तेज कंपकंपी, दौरे, भ्रम, बेहोशी या दूसरी गंभीर समस्या दिखाई दे, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
यह बात हर व्यक्ति के लिए सटीक नहीं बैठती है। खासकर लंबे समय से शराब या कुछ अन्य नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति में अचानक सेवन बंद करने पर गंभीर लक्षण हो सकते हैं। इसलिए लंबे समय से नशे का सेवन करने वाले व्यक्ति को बिना चिकित्सकीय सलाह के अचानक नशा बंद करने के बजाय डॉक्टर या डी-एडिक्शन सेंटर से संपर्क करना चाहिए।
अगर नशा बंद करने के बाद तेज कंपकंपी, दौरे, भ्रम, बेहोशी या दूसरी गंभीर समस्या दिखाई दे, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। भारत में डी-एडिक्शन कार्यक्रमों के तहत इलाज और पुनर्वास दोनों पर काम किया जाता है। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कई संस्थानों में ओपीडी, इनपेशेंट और फॉलो-अप जैसी सेवाएं भी मौजूद हैं।
नशा छोड़ने के बाद सबसे बड़ी चुनौती लंबे समय तक उससे दूर रहना होता है। इसके लिए व्यक्ति को उन परिस्थिति और लोगों से दूरी बनानी जरूरी है, जो दोबारा नशे की ओर ले जा सकते हैं। इसके साथ नियमित काउंसलिंग, परिवार का सहयोग, स्वस्थ दिनचर्या और समय-समय पर फॉलो-अप के लिए डॉक्टर से मिलते रहना।
अगर बीच में दोबारा किसी वजह से नशा हो जाए तो इसे पूरी कोशिश की असफलता मानकर इलाज को बीच में छोड़ना सही नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर या काउंसलर से दोबारा संपर्क करना जरूरी है।
नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को लगातार ताने देना या शर्मिंदा करना उसके सिचुएशन को और भी मुश्किल बना सकता है। परिवार को समस्या को समझने, इलाज के लिए प्रोत्साहित करने और उपचार के दौरान सपोर्ट देने की कोशिश करनी चाहिए। कई डि-एडिक्शन सेंटर में परिवार की भी काउंसलिंग की जाती है।
भारत में सरकारी अस्पतालों और डि-एडिक्शन सेवाओं के जरिए उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (एनडीडीटीसी), एम्स, नई दिल्ली प्रमुख संस्थान है और देश के अलग-अलग हिस्सों में डग ट्रीटमेंट क्लीनिक भी संचालित किए जाते हैं।
बता दें कि किसी प्राइवेट रिहैब सेंटर में डॉक्टरी परामर्श लेने या इलाज शुरु करने से पहले उसकी चिकित्सकीय सुविधाएं, योग्य विशेषज्ञ, इलाज का तरीका और मान्यता से जुड़ी जानकारी जरूर जांचनी चाहिए।