आज है 'भीष्म द्वादशी', इस शुभ मुहूर्त में पूजा से मिलेगा पूर्वजों का विशेष आशीष, जानिए इसका पौराणिक नाता

Bhisma Dwadashi 2024
भीष्म द्वादशी 2024 (डिजाइन फोटो)
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सीमा कुमारी

नई दिल्ली: हर साल माघ महीने की द्वादशी तिथि को 'भीष्म द्वादशी' का पावन पर्व मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष यह द्वादशी (Bhisma Dwadashi 2024) आज यानी 20 फरवरी 2024 दिन मंगलवार को है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ श्री कृष्ण की पूजा करने का भी विधान है। शास्त्रों के अनुसार, भीष्म पितामह ने अष्टमी तिथि को अपने प्राण त्याग दिए थे और द्वादशी तिथि के दिन धार्मिक कर्म किए गए है। इसी के कारण इसे भीष्म द्वादशी के नाम से जानते हैं। आइए जानें भीष्म द्वादशी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि इसकी महिमा-

शुभ मुहूर्त 

पंचांग के अनुसार इस बार माघ माह की भीष्म द्वादशी 20 फरवरी 2024 दिन मंगलवार को है। इस दिन एकादशी तिथि सुबह 9 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होने के बाद द्वादशी तिथि लग जाएगी और यह पूरे दिन रहेगी। द्वादशी तिथि 20 फरवरी को 9 बजकर 55 मिनट के बाद प्रारंभ होने के कारण भीष्म द्वादशी मंगलवार के दिन मान्य होगी।

पूजन विधि 

भीष्म द्वादशी पर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान आदि करके भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करना चाहिए। भगवान विष्णु और श्री कृष्ण को पीला फूल, माला, पीला चंदन चढ़ाएं। इसके साथ ही भोग लगाएं और तुलसी का दल अर्पित करें। इसके साथ ही घी का दीपक और धूपबत्ती जलाकर विधिवत मंत्र, चालीसा का पाठ कर लें। अंत में विधिवत आरती करने के बाद भूल चूक के लिए माफी मांग लें।

भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की पूजा करने के बाद भीष्म पितामह को भी तिल, जल और कुश से तर्पण करें। इससे उनकी कृपा भी प्राप्त होगी।

यह तो आप सभी जानते हैं कि श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान रूपी गीता बता कर महाभारत का युद्ध जिताया था। इसी महाभारत युद्ध के एक मुख्य पात्र भीष्म पितामह भी थे। यह भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और इनको अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। 

महाभारत युद्ध में उन्हें बाण लगने के कारण वह उसके जाल में फंस कर शैय्या पर गिर पड़े और जीवन की अंतिम सांसे ले रहे थे। इस दौरान वह सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि श्री कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा था कि जो प्राणी सूर्य के उत्तरायण के दौरान देह त्यागते हैं या जिनकी मृत्यु इस दौरान होती हैं उन्हें मोक्ष मिलता है। भीष्म पितामह ने भी ठीक उसी दिन को देह त्यागने के लिए चुना। जिस दिन उन्होंने देह त्यागा था मान्यता के अनुसार सूर्य उस समय उत्तरायण थे और वह माघ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का दिन था। देह त्यागने के चार दिन बाद भीष्म पितामह को समर्पित उनके श्राद्ध कर्म का दिन भीष्म द्वादशी के रूप में पूजा जाने लगा।

भीष्म द्वादशी पर मिलता है पूर्वजों का आशीर्वाद 

मान्यता के अनुसार, माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म पितामह का तर्पण और उनका श्राद्ध कर्म करने की परंपरा इस दिन से चलती चली आ रही है। माना जाता है कि भीष्ण द्वादशी के दिन पूर्वजों के प्रति पिंड दान करना, पूर्वजों का तर्पण करना और उनके निमित्त दान-पुण्य करने से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। 

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