आखिर क्यों नहीं खानी चाहिए अश्वगंधा की पत्तियां, सरकार ने क्यों लगाया बैन? एक्सपर्ट से जानें सबकुछ
Ashwagandha Leaves Banned: एफएसएसएआई और आयुष मंत्रालय ने अश्वगंधा की पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। अब सप्लीमेंट में केवल जड़ों के उपयोग की अनुमति होगी। जानिए ऐसा फैसला क्यों लेना पड़ा।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
FSSAI Latest Update on Ashwagandha: आयुर्वेद में अश्वगंधा को जड़ी-बूटियों का राजा कहा जाता है और आज के दौर में यह फिटनेस इंडस्ट्री का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सरकार द्वारा लिए गए एक बड़े फैसले ने सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों और ग्राहकों दोनों को हैरान कर दिया है। हाल ही में इसकी पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है।
अक्सर तनाव और थकान दूर करने के लिए इस्तेमाल होने वाले अश्वगंधा के पौधों की पत्तियों पर अब पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया बल्कि इसके पीछे गंभीर वैज्ञानिक शोध और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं शामिल हैं। अब बाजार में मिलने वाले उत्पादों में केवल अश्वगंधा की जड़ों के इस्तेमाल की ही अनुमति दी जाएगी।
पत्तियों में छिपा सेहत के लिए बड़ा खतरा
कई रिसर्च में यह पाया गया है कि अश्वगंधा की पत्तियों में विदेनोलाइड्स नामक तत्व बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। खासकर इसमें मौजूद विदाफेरिन-ए नामक तत्व शरीर के अंगों पर काफी नकारात्मक असर डाल सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो इन तत्वों की अधिकता से लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचने की संभावना रहती है। इसके अलावा पेट से जुड़ी समस्याएं और नर्वस सिस्टम पर भी इसके दुष्प्रभाव देखे गए हैं।
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यही वजह है कि पोलैंड और हंगरी जैसे यूरोपीय देशों ने पहले ही इन पत्तियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा रखी थी। शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ने वाली इन पत्तियों के सेवन से थायराइड का स्तर भी अनियंत्रित हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पत्तियों में मौजूद टॉक्सिक तत्व लंबे समय में नसों से जुड़ी गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं।
आयुर्वेद के ग्रंथों में जड़ दिया गया है को महत्व
हजारों साल पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी अश्वगंधा की जड़ को ही आंतरिक सेवन के लिए सुरक्षित और प्रभावी बताया गया है। आयुष मंत्रालय के अनुसार पारंपरिक रूप से पत्तियों का उपयोग केवल त्वचा पर लगाने या बाहरी उपचार के लिए किया जाता था। भोजन या सप्लीमेंट के तौर पर पत्तियों को खाने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण या ऐतिहासिक आधार मौजूद नहीं है।
जड़ का उपयोग सदियों से होता आ रहा है और आधुनिक शोध भी इसे सही मात्रा में लेने पर पूरी तरह सुरक्षित मानते हैं। अश्वगंधा शब्द का अर्थ ही घोड़े के पसीने जैसी महक से जुड़ा है और इसे जड़ के रूप में लेने से शरीर में वैसी ही ताकत आने की बात कही गई है। इसीलिए नियामक संस्थाओं ने अब केवल जड़ आधारित उत्पादों को ही अनुमति दी है।
सस्ते के चक्कर में कंपनियां कर रही खेल
बाजार में अश्वगंधा की बढ़ती मांग को देखते हुए कई कंपनियां अधिक मुनाफा कमाने के लिए नियमों को ताक पर रख रही थीं। दरअसल अश्वगंधा की पत्तियां इसकी जड़ों के मुकाबले करीब 100 गुना तक सस्ती होती हैं। कंपनियां अपनी लागत कम करने के लिए जड़ों के साथ पत्तियों को भी पीसकर पाउडर में मिला रही थीं। यह उपभोक्ताओं की सेहत के साथ किया जाने वाला एक बड़ा खिलवाड़ था क्योंकि इसके सेवन से फायदे के बजाय नुकसान होने का खतरा ज्यादा था। यह प्रवृत्ति खासकर तब बढ़ी जब वेलनेस इंडस्ट्री में सप्लीमेंट का चलन बहुत तेजी से बढ़ा।
सरकार ने जारी किए सख्त लेबलिंग नियम
नए नियमों के लागू होने के बाद अब सप्लीमेंट बनाने वाली हर कंपनी को अपने पैकेट पर यह साफ-साफ लिखना होगा कि उन्होंने पौधे के किस हिस्से का इस्तेमाल किया है। एफएसएसएआई ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे बाजार में बिक रहे उत्पादों की कड़ी निगरानी करें और उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर कानूनी कार्रवाई की जाए। यह फैसला उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है क्योंकि अब कंपनियों को पारदर्शिता बरतनी होगी।
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विशेषज्ञों का कहना है कि यह एहतियाती कदम भविष्य में होने वाली बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मददगार साबित होगा। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई कंपनी अश्वगंधा की पत्तियों या उनके एक्सट्रैक्ट का इस्तेमाल करती पाई जाती है तो उसे भारी जुर्माना और सजा भुगतनी होगी।
