AI भी खा गया धोखा, नकली बीमारी ने खोली टेक्नोलॉजी की पोल, कैसे भविष्य के लिए है खतरा
AI Fake News: तकनीक की दुनिया में लंबे समय से यह धारणा बनी हुई है कि बड़े AI कभी गलती नहीं करते। लेकिन 2024 में हुए एक छोटे से वैज्ञानिक प्रयोग ने इस सोच को पूरी तरह हिला दिया।
- Written By: सिमरन सिंह
AI Use (Source. Freepik)
Misinformation By AI: तकनीक की दुनिया में लंबे समय से यह धारणा बनी हुई है कि बड़े लैंग्वेज मॉडल कभी गलती नहीं करते। लेकिन 2024 में हुए एक छोटे से वैज्ञानिक प्रयोग ने इस सोच को पूरी तरह हिला दिया। ‘बिक्सोनिमेनिया’ नाम की एक ऐसी बीमारी सामने आई, जिसके बारे में पहले किसी ने नहीं सुना था। दावा किया गया कि कंप्यूटर के अधिक इस्तेमाल से आंखों में यह खतरनाक समस्या होती है।
हैरानी की बात यह थी कि इस रिसर्च पेपर में दिए गए लेखक, संस्थान और फंडिंग के स्रोत सब कुछ पूरी तरह फर्जी थे। इसके बावजूद ChatGPT और Gemini जैसे बड़े AI टूल्स ने बिना जांच-पड़ताल के इस झूठ को सच मान लिया और इंटरनेट पर इसे एक असली बीमारी की तरह पेश करने लगे।
AI मॉडल्स भी खा गए धोखा
इस घटना ने साफ कर दिया कि AI भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है। जब जानकारी दिखने में विश्वसनीय लगती है, तो AI सिस्टम भी उसे सच मान लेते हैं। यही कारण है कि बिक्सोनिमेनिया जैसी काल्पनिक बीमारी को भी AI ने वास्तविक हेल्थ कंडीशन के रूप में प्रस्तुत कर दिया, जिससे लोगों में भ्रम और बढ़ गया।
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इंसान और मशीन दोनों की एक जैसी कमजोरी
यह मामला सिर्फ AI तक सीमित नहीं है। आज के समय में इंसान भी गलत जानकारी का उतनी ही तेजी से शिकार होता है। इसकी वजह है हमारी मानसिक प्रवृत्तियां, पूर्वाग्रह और दूसरों पर निर्भर रहने की आदत। यही कारण है कि गलत जानकारी तेजी से फैलती है और लोग उसे बिना सोचे-समझे सच मान लेते हैं।
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कैम्ब्रिज फेस्टिवल का चौंकाने वाला प्रयोग
हाल ही में कैम्ब्रिज फेस्टिवल में द ट्रेटर्स थीम पर आधारित एक साइंस इवेंट आयोजित हुआ। इसमें चार पैनलिस्ट्स ने अपनी रिसर्च पेश की, जिनमें कुछ की जानकारी पूरी तरह गलत थी। ऑडियंस को तय करना था कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ।
नतीजा चौंकाने वाला रहा ज्यादातर लोग सही और गलत में फर्क नहीं कर पाए। कई बार असली रिसर्च को गलत समझा गया, जबकि झूठी जानकारी देने वाले ज्यादा भरोसेमंद लगे। इससे यह साफ हुआ कि लोग सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि प्रस्तुति, भाषा, कपड़े और एक्सेंट के आधार पर भी निर्णय लेते हैं।
सिर्फ पढ़ाई नहीं, समझदारी भी जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीकी या गणितीय ज्ञान काफी नहीं है। आज के दौर में क्रिटिकल थिंकिंग यानी तार्किक सोच बेहद जरूरी हो गई है। हालांकि शिक्षा प्रणाली में विज्ञान और गणित पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन आलोचनात्मक सोच को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही। यही वजह है कि लोग आसानी से फर्जी खबरों और गलत जानकारी के जाल में फंस जाते हैं।
