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Five State Assembly Elections: देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान हो चुका है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के चुनावी तारीखों का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। चुनाव की घोषणा के साथ ही सभी चुनावी राज्यों में तत्काल प्रभाव से आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है। अब सरकारें किसी भी नई योजना या लोक-लुभावन घोषणाओं को अमली जामा नहीं पहना सकेंगी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में 294, तमिलनाडु में 234, केरल में 140, असम विधानसभा में 126 और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में 30 विधानसबा सीटें हैं। इन पांचों राज्यों में कहीं सत्ता बचाने की चुनौती है, तो कहीं पहली बार इतिहास रचने की कोशिश होने वाली है।
इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में न केवल सूबों का सियासी भविष्य तय होने वाला है, बल्कि देश की सियासी दशा और दिशा तय होने वाली है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां बीजेपी अब तक सत्ता में नहीं आ सकी जबकि असम में तीसरी बार और पुडुचेरी में दूसरी बार सत्ता में आने को बेताब है। चलिए जानते हैं बंगाल से लेकर केरल और तमिलनाडु तक किस तरह की क्यों चुनौती और क्या सियासी गणित है?
ममता बनर्जी पिछले 15 सालों से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हैं। अगर वह 2026 के चुनावों में फिर से जीतती हैं तो लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगी। ऐसा हुआ तो वह देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बन जाएंगी, जिसने यह उपलब्धि हासिल की है। हालांकि, इस चुनाव में उनके सामने मुख्य चुनौती भाजपा ही है। ममता बनर्जी 2011 से पश्चिम बंगाल की कमान संभाल रही हैं और टीएमसी ने लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते हैं। इस लिहाज से देखें तो जहां ममता बनर्जी लगातार चौथी जीत के लिए जोर लगा रही हैं, वहीं भाजपा किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने के लिए बेताब है।
बंगाल विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 7 मई 2026 को खत्म होने वाला है। पश्चिम बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटें हैं। 2021 के चुनावों में टीएमसी ने 213 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को सिर्फ 77 सीटें मिली थीं। ऐसे में यह चुनाव ममता बनर्जी के लिए सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने की एक परीक्षा है, जबकि वामपंथी दलों और कांग्रेस के लिए यह अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनौती काफी हद तक कांग्रेस और वामपंथी दलों के पतन के कारण बढ़ गई है। उनके वोट का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ जाने के बजाय टीएमसी की तरफ चला गया है। पिछले दो चुनावों में बीजेपी की सीटों में इजाफा जरूर दिखा है लेकिन उसका वोट शेयर सिर्फ 1.5 प्रतिशत बढ़ा है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने 3 प्रतिशत अतिरिक्त वोट हासिल किए। फिर भी ममता बनर्जी के सत्ता में 15 साल के कार्यकाल को देखते हुए सत्ता-विरोधी लहर की एक दबी हुई भावना भी मौजूद है। इस एंटी इन्कंबेंसी का फायदा उठाने की भाजपा भरपूर कोशिश कर रही है।
दक्षिण भारत में तमिलनाडु देश का इकलौता राज्य है, जहां पिछले छह दशकों से कांग्रेस या बीजेपी की सरकार नहीं बनी है। यहां की सत्ता पर डीएमके और AIADMK का ही वर्चस्व देखने को मिला है। इस बार बीजेपी का AIADMK के साथ गठबंधन है तो कांग्रेस डीएमके का साथ दे रही है। इसके अलावा सुपरस्टार थलापति विजय की पार्टी TVK भी चुनावी मैदान में है, जिसके चलते मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
तमिलनाडु विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 10 मई 2026 को खत्म होने वाला है। राज्य में कुल 234 विधानसभा सीटें हैं। 2021 में एमके स्टालिन के नेतृत्व में DMK ने 133 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। DMK के साथ गठबंधन में कांग्रेस पार्टी भी 18 सीटें जीतने में कामयाब रही। एक दशक तक सत्ता संभालने वाली AIADMK सिर्फ 66 सीटें ही जीत पाई। AIADMK के साथ गठबंधन के बाद भाजपा ने चार सीटें हासिल की थीं।
2026 के विधानसभा चुनावों से पहले बहुत कुछ बदल गया है। जहां एक तरफ स्टालिन के लिए अपनी सरकार बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है, वहीं AIADMK भी सत्ता में वापसी के लिए उतनी ही बेताब है। इस बार तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में न सिर्फ NDA और INDIA गठबंधन मैदान में हैं, बल्कि एक तीसरा मोर्चा” भी चुनावी दंगल में उतर आया है।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव (इन्फोग्राफिक-AI)
तमिल अभिनेता थलापति विजय ने अपनी खुद की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ बनाकर DMK और AIADMK के बीच चली आ रही पारंपरिक चुनावी लड़ाई को एक त्रिकोणीय मुकाबले में बदल दिया है। यह अभी भी अनिश्चित है कि सुपरस्टार विजय किसकी चुनावी संभावनाओं को मजबूत और किसकी संभावनाओं को कमज़ोर करेंगे। ऐसे में DMK और AIADMK दोनों ही पूरी तरह से सतर्क हैं।
केरल देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां वामपंथी सरकार सत्ता में बनी हुई है। ऐतिहासिक रूप से इस राज्य में सरकारों के बारी-बारी से बदलने की परंपरा रही है। हालांकि 2021 में वाम मोर्चा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस चलन को तोड़ दिया और इस तरह इतिहास रच दिया। इस बार वामपंथ के सामने केरल में अपने राजनीतिक गढ़ को बचाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF अपने एक दशक लंबे राजनीतिक वनवास को खत्म करने के लिए तैयार है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन इस समय सत्ता में वापसी करने के लिए ‘सत्ता-विरोधी’ भावनाओं को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर उनका लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। अब तक भाजपा केरल में विधानसभा की एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई है। फिर भी 2024 के आम चुनावों में त्रिशूर लोकसभा सीट जीतकर और दिसंबर 2025 में तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्ज़ा करके पार्टी ने अपनी बढ़ती ताकत का प्रदर्शन किया है। यह एक ऐसा घटनाक्रम है जो UDF और LDF दोनों के लिए एक चुनौती पेश करता है।
केरल विधानसभा का वर्तमान कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त होने वाला है। केरल में लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर चुके वाम मोर्चे के सामने अब UDF से एक कड़ी चुनौती है। यदि पिनाराई विजयन केरल में तीसरी बार सत्ता हासिल करने में सफल हो जाते हैं तो यह एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड होगा। इसके विपरीत यदि उन्हें हार का सामना करना पड़ता है तो यह राष्ट्रीय पटल से वामपंथ के पूर्ण राजनीतिक सफाया का संकेत हो सकता है। केरल में चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से वाम-नेतृत्व वाले LDF और कांग्रेस-नेतृत्व वाले UDF गठबंधनों के बीच एक सीधी लड़ाई है।
2021 के विधानसभा चुनावों में LDF ने 99 सीटें जीतकर सफलतापूर्वक सत्ता बरकरार रखी थी। इस बार कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापसी करने के लिए पूरी ताकत से प्रयास कर रही है। प्रियंका गांधी के केरल से संसद सदस्य होने और राहुल के करीबी सहयोगी केसी वेणुगोपाल के भी इसी राज्य से ताल्लुक रखने के कारण कांग्रेस सरकार की बागडोर फिर से संभालने के लिए उत्सुक है। दूसरी तरफ भाजपा अपने राजनीतिक प्रभाव और जनाधार का विस्तार करने पर केंद्रित है।
असम में भाजपा पिछले दस वर्षों से सत्ता में है और अब उसने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने के प्रयास में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने पहली बार 2016 में असम में सत्ता संभाली और 2021 में इतिहास रच दिया। पार्टी ने अब 126 सदस्यों वाली असम विधानसभा में 100 से ज़्यादा सीटें जीतने का एक बड़ा लक्ष्य रखा है। यहां बांग्लादेशी घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और असमिया पहचान मुख्य मुद्दे हैं। भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने आठ अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन किया है। कांग्रेस अपने राजनीतिक वनवास को खत्म करने की कोशिश कर रही है।
असम विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 20 मई 2026 को खत्म होने वाला है। पिछली यानी 2021 के असम विधानसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने 126 में से 75 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी। कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 50 सीटों पर जीत हासिल की। हिमंत बिस्वा सरमा असम के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा उन्हें ही अपना चेहरा बनाकर चुनावी मैदान में उतरी है।
असम में ‘तीसरे मोर्चे’ का प्रतिनिधित्व मुस्लिम राजनीति के एक प्रमुख चेहरे बदरुद्दीन अजमल कर रहे हैं। हालांकि, जहां एक तरफ भाजपा को सत्ता में अपने दस साल के कार्यकाल के कारण जनता की कुछ नाराज़गी का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को अपने नेतृत्व को लेकर अंदरूनी कलह का सामना करना पड़ रहा है। जिस तरह से भाजपा ‘हिंदुत्व कार्ड’ खेल रही है उसे देखते हुए असम में सत्ता में वापसी करना कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 15 जून, 2026 को खत्म होने वाला है। सीटों की संख्या के मामले में पुडुचेरी की विधानसभा देश की सबसे छोटी विधानसभा है। 2021 में AINRC-भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस को सत्ता से हटाकर सरकार बनाई थी। एन. रंगासामी मुख्यमंत्री बने। यह पहला मौका था जब भाजपा पुडुचेरी में सरकार में सीधे तौर पर साझीदार बनी। इस बार कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की कोशिश में DMK के साथ गठबंधन किया है और पिछली सरकार के गिरने के मुद्दे का इस्तेमाल करके सत्ता विरोधी लहर को हवा देने की कोशिश कर रही है।
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2021 में हुए पिछले चुनावों में ऑल इंडिया NR के बीच गठबंधन कांग्रेस (AINRC) और भाजपा ने कुल 30 सीटों में से 16 सीटें जीतकर सरकार बनाई। AINRC ने 10 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 6 सीटें मिलीं। इसके बिल्कुल उलट कांग्रेस सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई। फिलहाल AINRC के संस्थापक एन. रंगासामी मुख्यमंत्री हैं। एक बार फिर यहां चुनावी मुकाबला NDA और INDIA गठबंधन के बीच है। इस स्थिति में दोनों पक्षों के सामने एक चुनौती है। भाजपा गठबंधन सत्ता में बने रहने के लिए लड़ रहा है, जबकि कांग्रेस वापसी करने के लिए बेताब है।