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Explainer: क्यों वापस नहीं लाई जाती एवरेस्ट में मरने वाले पर्वतारोहियों की बॉडी? विज्ञान नहीं ये है बड़ा कारण
- Written By: अक्षय साहू
Everest Dead Bodies Reason: माउंट एवरेस्ट पर अक्सर चढ़ाई के दौरान मारे गए पर्वतारोहियों की लाशों को वहीं छोड़ दिया जाता है। ऐसा क्यों किया जाता है? इसके पीछे के मुख्य कारण क्या है?

पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी की एवरेस्ट मिशन के दौरान मौत (सोर्स- सोशल मीडिया)
Why Everest Climbers Dead Bodies Not Brought Back: हैदराबाद के टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी हाल ही में माउंट एवरेस्ट फतह करने के मिशन पर निकले थे। जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा भी किया, लेकिन शिखर से वापस लौटते समय डेथ जोन में उनकी ताबियत बिगड़ी और शेरपाओं की लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। इसके बाद उनके साथ गई टीम अरुण के शरीर को वहीं छोड़कर वापस नीचे उतर आई।
अरुण के मृत शरीर को एवरेस्ट पर छोड़ने का फैसला केवल उनके साथ गई टीम का नहीं था, बल्कि अरुण के परिवार ने उन्हें इसकी इजाजत दी थी। एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है। जिस पर हर साल सैकड़ों लोग चढ़ाई करने की कोशिश करते हैं। इनमें से कई सफलतापूर्वक चढ़ाई के बाद नीचे लौट आते हैं, तो कई रास्ते में ही अपनी जान खो बैठते हैं। नेपाल की सरकार के मुताबिक, वर्तमान में एवरेस्ट पर 200 से अधिक लाशें पड़ी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि एवरेस्ट पर मरने वाले पर्वतारोहियों के शरीर को वापस क्यों नहीं लाया जाता है? डेथ जोन क्या है? एक पर्वतारोही शरीर को एवरेस्ट से नीचे लाने में किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है?
धार्मिक और आर्थिक कारण वजह
माउंट एवरेस्ट पर मारने जाने वाले पर्वतारोहियों के शरीर को वापस नहीं लाए जाने के पीछे मुख्यतः दो कारण हैं। धार्मिक और आर्थिक। अरुण कुमार तिवारी के परिवार ने इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा। उनका कहना है कि अरुण भगवान शिव के भक्त थे और उनकी मौत हिमालय में हुई। ऐसे में वो चाहतें हैं कि उनका शरीर हिमालय में ही रहे।
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एवरेस्ट से डेड बॉडी लाना मुश्किल काम (सोर्स- सोशल मीडिया)
वहीं, अगर आर्थिक कारणों की बात करें तो एवरेस्ट से किसी व्यक्ति के शरीर को नीचे लाना भारी खर्चे का काम है। जैसे अरुण की मौत के बाद उनके शरीर को नीचे लाने के लिए एक करोड़ रुपए की मांग की गई। जिसे बाद में कम करके 94 लाख कर दिया गया। अब इतनी बड़ी रकम किसी भी परिवार के लिए जुटाना आसान नहीं है। ऐसे में परिवार ने अरुण के शरीर को वहीं रहने देने का फैसला किया।
शरीर को एवरेस्ट से नीचे लाने में कई परेशानियां
एवरेस्ट से डेड बॉडी को नीचे लाना एक चुनौतीपूर्ण और जानलेवा काम है। क्योंकि जिस ऊंचाई पर पर्वतारोहियों की मौत होती है, वहां हवा पतली होती है। इसके चलते सांस लेने में बहुत मुश्किल होती है। पर्वतारोही इतनी ऊंचाई पर जितना हो सके उतना कम वजन लेकर चलना चाहते हैं। उदाहरण के तौरपर पर्वतारोही अपने साथ जो टूथब्रश ले जाते हैं उसका हेंडल तक काट देते हैं, ताकि उतना ही वजन कम हो जाए। वहीं, डेथ जोन और उसके आसपास जब किसी पर्वतारोही की मौत होती है तो उसके शरीर का वजन बर्फ के साथ डेढ़ कुंतल तक हो जाता है।
एवरेस्ट में ही छोड़ दी जाती हैं पर्वतारोहियों की लाशें (सोर्स- सोशल मीडिया)
पहाड़ पर चढ़ाई करने वाले लोग जो पहले ही थके होते हैं, उनके लिए इतना वजन उठाना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। इसके चलते लाश को नीचे लाने के लिए भारी रकम की डिमांड की जाती है। इसके अलावा एवरेस्ट पर मौसम ज्यादातर समय खराब रहता है। जो इस तरह के मिशन को और भी मुश्किल बना देता है। यही कारण है कि अधिकतर समय लाशें वहीं छोड़ दी जाती हैं और इसे गलत भी नहीं माना जाता है। जो पर्वतारोही एवरेस्ट पर चढ़ाई करने जाते हैं, उनसे पहले कई फॉर्म भरवाए जाते हैं। जिनमें वो खुद टीम को इस बात इजाजत देते हैं कि अगर चढ़ाई करते हुए उनकी मौत हो जाए, तो उनकी लाश को वहीं छोड़ दिया जाए।
शरीर को वापस लाना है या नहीं कौन तय करता है?
किसी पर्वतारोही के शरीर को वापस लाना है या नहीं इसका फैसला साथ गई टीम मौसम और परिस्थितियों का ध्यान में रखकर करती है। हालांकि, वो इसके लिए पहले परिवार से इजाजत लेते है और खर्च के बारे में जानकारी देते हैं। जब परिवार के ओर से हामी मिलती है इसके बाद ही शरीर को नीचे लाया जाता है। लेकिन कई बार खराब मौसम को देखते हुए भी शरीर को वहीं छोड़ दिया जाता है।
क्या होता है डेथ जोन?
दुनिया में आठ हजार मीटर से ऊंची केवल 14 चोटियां है। इनमें से सभी हिमालय का हिस्सा है। इन चोटियों में समुद्र तल से लगभग 8,000 मीटर (26,247 फीट) ऊपर के हिस्से को डेथ जोन कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम होती है, जिसके चलते सांस लेना काफी मुश्किल होता है। यही वजह है कि इन चोटियों पर चढ़ाई करने वाले पर्वतारोही अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर ले जाते हैं। इसके अलावा इस ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को कई शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
डेथ जोन में सांस लेना होता है मुश्किल (सोर्स- सोशल मीडिया)
डेथ जोन में अक्सर डेथ जोन पर्वतारोहियों हाई एल्टीट्यूड सिकनेस जैसे- तेज सिरदर्द, चक्कर आना, खून की उल्टी, थकान, नींद न आना और सांस फूलने जैसी परेशानियों का समाना करना पड़ता है। इसके अलावा फेफड़ों में पानी भरने लगता है, शरीर को ऑक्सीजन नहीं मिलती और दिमाग सूजने लगता है।
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हवाई ऑपरेशन चलाना भी मुश्किल
लोग दिमाग में अक्सर ये सवाल आता हैं कि हेलीकॉप्टर भेजकर भी तो पर्वतारोही की जान बचाई जा सकती है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। डेथ जोन में हवा पतली होती है। जो हेलीकॉप्टर के रोटर को नीचे धकेलता है। साथ ही हवा पतले होने के कारण हेलीकॉप्टर को पर्याप्त लिफ्ट नहीं मिलता है और इंजन की ताकत कमजोर हो जाती है।
ऊंचाई के चलते हेलीकाप्टर से रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना मुश्किल (सोर्स- सोशल मीडिया)
इसके अलावा डेथ जोन में मौसम अधिकतर खराब रहता है, जहां हेलीकॉप्टर को उड़ा पाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में पायलट की जान को भी खतरा होता है। हालांकि मौसम साफ होने पर कई बार रेस्क्यू ऑपरेशन किए गए हैं। लेकिन 6000-7000 मीटर की ऊंचाई पर।
Why mount everest bodies are not recovered cost danger family decisions
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