Explainer: तमिलनाडु में अब तक क्यों बेअसर साबित हुई बीजेपी? अन्नामलाई की इस्तीफे के बीच उठ रहे सवाल

Tamil Nadu BJP: 2026 विधासभा चुनाव में गठबंधन के साथ बीजेपी चुनाव लड़ी थी। बावजूद इसके पार्टी महज एक सीट पर जीत दर्ज कर सकी। चुनाव के ठीक बाद अन्नामलाई के इस्तीफे के बीच कई सवाल उठने लगे हैं।
Why has the BJP proved ineffective in Tamil Nadu so far
तमिलनाडु में बीजेपी क्यों बेअसर? (सोर्स- AI)
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Tamil Nadu BJP Political Crisis: तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के साथ शुरू हुई सियासी खेल अभी भी खत्म होता नजर नहीं आ रहा। पहले चुनावी नतीजे और अब इस्तीफे की घोषणाओं ने राज्य के सियासी तापमान को और बढ़ा दिया है। बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई ने अपना इस्तीफा पार्टी को सौंप दिए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से वह पार्टी से नाराज चल रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा भी दावा किया जा रहा है कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें मनाने का कोशिश की है। खबर यह भी है कि अमित शाह उनसे मुलाकात कर सकते हैं और इस्तीफा वापस लेने का दबाव बना सकते हैं।

दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में बीजेपी के लिए अपने संगठन का विस्तार करना और जीत हासिल करना अन्य राज्यों की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। उत्तर भारत से पश्चिम भारत तक चुनाव दर चुनाव पार्टी ने खुद को काफी तेजी से मजबूत किया है। हालांकि, तमिलनाडु में ऐसा नहीं हो सका है। पिछले कुछ समय से पीएम मोदी और अमित शाह समेत पार्टी संगठन और बीजेपी से जुड़े फ्रंटल संगठनों ने इस राज्य में पार्टी के विस्तार के विस्तार करने की कोशिश की है।

अन्नामलाई के इस्तीफे की बीच उठ रहे सवाल

हाल में संपन्न हुए विधासभा चुनाव में एनडीए गठबंधन के तहत बीजेपी चुनावी मैदान में उतरी थी। बावजूद इसके पार्टी महज एक सीट पर जीत दर्ज कर सकी। चुनाव के ठीक बाद अन्नामलाई के इस्तीफे के बीच कई सवाल उठने लगे हैं। आखिर वो कौन से कारण हैं, जो तमिलनाडु में बीजेपी का जादू नहीं चल पाया, राज्य में भगवा पार्टी के सामने किस तरह की चुनौतियां हैं। आइए सबकुछ विस्तार से समझते हैं।

तमिलनाडु में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद बड़ा खतरा

तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहां का इतिहास द्रविड़ राजनीति से जुड़ा है। यहां द्रविड़ियन पार्टियों का वर्चस्व रहा है। पार्टी गठन के बाद ही डीएमके और एआईएडीएमके ने तमिलनाडु में समाजिक न्याय, तमिलों की अलग पहचान को आगे रखा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के सहारे राज्य में सियासी जमीन तलाशने की कोशिश की है। शुरुआती सालों में, तमिलनाडु में बीजेपी की मौजूदगी लगभग न के बराबर थी। इस राज्य में बीजेपी को हमेशा से उत्तर भारतीय की पार्टी या बाहर की पार्टी के रूप में पहचान देने की कोशिश की गई है।

कन्याकुमारी में हिंदुत्व राजनीतिक की शुरुआत

साल 1982 में कन्याकुमारी जिले के मंडाइकडू में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद राज्य हिंदुत्व की राजनीति को जोर मिला। इसके बाद 1984 में हुए विधानसभा चुनाव में हिंदू मुन्नानी संगठन समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी वी. बालाचंद्रन ने पद्मनाभपुरम सीट पर 28,465 वोटों से जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में बीजेपी के ज्यादातर प्रत्याशी चुनाव हार गए थे, लेकिन कोलाचेल सीट से एम. आर . गांधी ने 32,000 से अधिक वोट हासिल किए। उन्हें सिर्फ 589 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस नतीजे ने इस बात के संकेत दिए थे कि कन्याकुमारी में हिंदुत्व की राजनीति शुरुआती कदम बढ़ा चुकी है। कन्याकुमारी जिला केरल से लगा हुआ है।

1996 में पहली बार विधानसभा में मिली एंट्री

तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने के लिए बीजेपी को काफी लंबा इंतजार करना पड़ा। साल 1996 के विधानसभा चुनावों में पद्मनाभपुरम सीट से सी. वेलाथुयन पहली बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बनें। इसके साथ ही विधानसभा में पार्टी को एंट्री मिली। इस चुनाव में उन्होंने 4,540 वोटों से जीत हासिल की थी। यह जीत पार्टी के लिए एक अहम टर्निंग प्वाइंट था, जब कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल, कोलाचेल और किल्लूर की सीटों पर वह दूसरे नंबर की पार्टी बनकर सामने आई। इसके बाद पार्टी ने गठबंधन के सहारे तमिलनाडु की राजनीति में कदम आगे बढ़ाया। बीजेपी ने एआईडीएमके और डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1998 में एआईडीएमके और 1999 में डीएमके के साथ चुनावी मैदान में उतरी।

2001 में बीजेपी के चार उम्मीदवारों की जीत

तमिलनाडु में बीजेपी के लिए साल 2001 काफी सुखद रहा, जहां उसके चार उम्मीदवारों ने चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इस चुनाव में डीएमके के साथ गठबंधन के तहत पार्टी ने कुल 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। जहां बीजेपी को 3.19% वोट मिले थे। 2021 में मिली सफलता से गदागद बीजेपी 2006 के चुनावों में बिना किसी गठबंधन अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। हालांकि, पार्टी की प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा। कुल 225 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई थी। वहीं, 221 सीटों पर पार्टी का जमानत भी जब्त हो गया था। 2011 और 2016 के चुनावों में भी पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

20 साल बाद तमिलनाडु में फिर खुला खाता

2006, 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में मिली असफलता के बाद बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए 2021 के चुनाव में फिर से गठबंधन का सहारा लिया। एआईडीएमके के साथ मिलकर पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और पार्टी को चार सीटों पर जीत मिली। इन चार नेताओं में बीजेपी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन तिरुनेलवेली से, एम. आर. गांधी नारकोइल से, वनथी श्रीनिवासन कोयंबटूर साउथ से, और सी. सरस्वती मोदकुरिची से जीत दर्ज की। इस दौरान बीजेपी को कुल 2.62% वोट मिले थे।

2026 में गठबंधन के साथ BJP ने लड़ा चुनाव

हाल में संपन्न हुए 2026 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने गठबंधन के तहत चुनावी मैदान में उतरी थी। एनडीए गठबंधन में एआईएडीएमके, जी.के. वासन की तमिल मनिला कांग्रेस (मूपानार) और बी. जॉन पांडियन की तमिलगा मक्कल मुन्नेत्र कषगम शामिल थीं। कुल 33 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ते हुए बीजेपी के केवल एक ही सीट पर जीत दर्ज कर सकी। वहीं, इस चुनाव में बीजेपी के वोट शेयरिंग 2.97 प्रतिशत रहा था।

बीजेपी के लिए अन्नामलाई ने बहाया पसीना

तमिलनाडु में बीजेपी के विस्तार के लिए पिछले कुछ प्रदेश अध्यक्षों- तमिलिसाई सौंदरराजन, एल. मुरुगन और के. अन्नामलाई ने काफी खून-पसीना बहाया। इन नेताओं ने पार्टी और आम लोगों के बीच बनी दूरी को कम करने का काम किया। खासतौर पर अन्नामलाई के अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी ने जमीन पर काफी सक्रियता दिखाई और सोशल मीडिया पर भी अन्नामलाई पार्टी के बड़े चेहरे के रूप में उभरे। उन्होंने पूरे तमिलनाडु में यात्रा निकाली और राज्य की तत्कालीन डीएमके सरकार को घेरा।

तमिलनाडु में बीजेपी के सामने चुनौतियां

तमिलनाडु में बीजेपी पर हिंदी भाषा थोपने की कोशिश का आरोप लगता रहा है। दक्षिण भारत के इस राज्य में बीजेपी अपना आधार मजबूत बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहने को मजबूर है। हिंदी बनाम तमिल का सवाल तमिलनाडु में हमेशा गूंजता रहा है। नई शिक्षा नीति, हिंदी भाषा थोपने, केंद्र द्वारा तमिलनाडु के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर विरोधी दल बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। हालांकि बीजेपी के सामने चुनौतियां काफी हैं लेकिन वह धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ाने में जुटी है।

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