प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
Tamil Nadu Assembly Elections 2026: तमिलनाडु के वेल्लोर जिले के पास स्थित पोइगई का ऐतिहासिक साप्ताहिक पशु बाजार, जो पिछले 100 सालों से हजारों किसानों और व्यापारियों की उम्मीदों का केंद्र रहा है, आज चुनावी नियमों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ महसूस कर रहा है।
दरअसल, चेन्नई-बेंगलुरु नेशनल हाईवे के किनारे स्थित पोइगई का यह बाजार वेल्लोर से करीब 10 किलोमीटर दूर है। इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां हर हफ्ते 2,000 से ज्यादा व्यापारी जुटते थे और एक ही दिन में करीब 1,500 पशुओं की खरीद-फरोख्त हो जाती थी। करोड़ों रुपए का यह कारोबार पूरी तरह से भरोसे और नकद लेनदेन पर टिका था। लेकिन आचार संहिता लागू होते ही इस रौनक को जैसे किसी की नजर लग गई है। बाजार की वह हलचल अब गायब है और व्यापारियों के चेहरों पर अनिश्चितता का डर साफ देखा जा सकता है।
चुनाव आयोग ने सुरक्षा कारणों से नकद ले जाने की सीमा महज 50,000 रुपए तय कर दी है, जो इस बड़े बाजार के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है। पशुओं की कीमत अक्सर इस सीमा से कहीं ज्यादा होती है, ऐसे में नकद के बिना सौदा करना असंभव हो गया है। जगह-जगह तैनात फ्लाइंग स्क्वॉड और निगरानी टीमें लगातार जांच कर रही हैं, जिससे व्यापारियों में भारी डर का माहौल है।
बिना हिसाब-किताब के नकद पकड़े जाने पर होने वाली सख्त कार्रवाई के डर से खरीदार और विक्रेता दोनों ही बाजार से दूरी बना रहे हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, सामान्य दिनों की तुलना में व्यापार में करीब 30 फीसदी तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
यह बाजार केवल वेल्लोर तक ही सीमित नहीं है। ये आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ-साथ तिरुपत्तूर और धर्मपुरी जैसे जिलों के व्यापारियों के लिए भी एक बड़ा केंद्र रहा है। अंतर-राज्यीय सीमाओं पर कड़ी चेकिंग के कारण बाहरी व्यापारियों ने अब यहां आना कम कर दिया है।
एक बड़ी चुनौती डिजिटल पेमेंट की भी है; ग्रामीण इलाकों के अधिकतर किसान और छोटे व्यापारी आज भी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के आदी नहीं हैं। उनके लिए स्मार्टफोन से भुगतान करना या बैंक के चक्कर काटना किसी सिरदर्द से कम नहीं है, जिससे पुराने ढर्रे पर चलने वाला यह व्यापार अब नए नियमों के बीच दम तोड़ रहा है।
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पशु बाजार का यह संकट केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। किसान अपनी जरूरत के वक्त पशु बेचकर घर का खर्च चलाते हैं, लेकिन खरीदार न होने से वे कर्ज के जाल में फंस सकते हैं। ऐसे में स्थानीय व्यापारियों और किसानों की मांग है कि चुनाव आयोग को वैध व्यापार के लिए कुछ रियायतें देनी चाहिए। व्यापारियों का कहना है कि चुनावी नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन इसके कारण एक सदी पुरानी व्यवस्था और गरीबों की रोजी-रोटी को लंबे समय तक नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।