
UGC के खिलाफ विरोध (Image- Social Media)
Supreme Court on UGC: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा जारी नए नियमों के क्रियान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इन नियमों में कई प्रावधान स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं, जिससे इनके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। बेंच ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इन गाइडलाइंस के मसौदे पर दोबारा विचार करे और नियमों को अधिक पारदर्शी, संतुलित और व्यावहारिक बनाए।
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने जनवरी 2026 में Equity in Higher Education Institutions Regulations जारी किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करना और छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करना बताया गया था।
लेकिन नियम सामने आते ही एक अहम सवाल उठने लगा क्या भारत में भेदभाव रोकने के लिए पहले से कानून, अदालतों के निर्देश और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद नहीं हैं? इसका जवाब है, हां। यही वजह है कि इस बार विरोध केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षकों, विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों और कानूनी जानकारों तक फैल गया।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 समानता का अधिकार देते हैं और जाति के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को सख्ती से प्रतिबंधित करते हैं। इसके अलावा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, सेवा नियम, विश्वविद्यालयों के अपने स्टैच्यूट्स, एंटी-रैगिंग नियम, Equal Opportunity Cells, इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटियां और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पहले से ही कार्यरत हैं। सुप्रीम कोर्ट भी कैंपस में भेदभाव और छात्र आत्महत्या जैसे मामलों में कई बार विश्वविद्यालयों को निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के निर्देश दे चुका है।
यही सबसे बड़ा सवाल है। जानकारों के मुताबिक, नए नियम कोई नया अधिकार नहीं देते, बल्कि पुराने अधिकारों को लागू कराने की शक्ति देते हैं। जो पहले सलाह या दिशा-निर्देश थे, अब वे बाध्यकारी नियम बन गए हैं। सरकारी और निजी दोनों तरह के संस्थानों को अब इनका पालन करना अनिवार्य होगा।
नए ढांचे के तहत हर संस्थान में Equal Opportunity Centre बनाना अनिवार्य किया गया है, जिसके भीतर एक Equity Committee होगी। इस समिति को पहले की तुलना में कहीं अधिक अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा 24×7 शिकायत प्रणाली, ऑनलाइन पोर्टल और सख्त समय-सीमा भी तय की गई है—जैसे शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर बैठक, 15 दिनों में जांच रिपोर्ट और सात दिनों के अंदर कार्रवाई।
अगर कोई संस्थान नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC उसकी फंडिंग रोक सकता है, मान्यता पर असर डाल सकता है और नए कोर्स की मंजूरी भी रोक सकता है। यानी 2012 के अपेक्षाकृत नरम नियमों की जगह अब 2026 का ढांचा अधिक सख्त, दंडात्मक और लागू करने योग्य बन गया है।
यहीं से असली विवाद शुरू होता है। कई विशेषज्ञों और प्रशासकों का कहना है कि जब पुराने कानून पहले से मौजूद थे, तो UGC ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे असफल क्यों साबित हुए। नए नियमों में दुरुपयोग रोकने के लिए कोई साफ प्रक्रिया नहीं बताई गई है जैसे फर्जी शिकायत की परिभाषा क्या होगी, सबूत का मानक क्या होगा, अपील की प्रक्रिया कैसी होगी या जांच के दौरान शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। कठोर दंड के डर से संस्थान अत्यधिक सतर्कता बरत सकते हैं, जिससे निष्पक्षता पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट अब तक दो सिद्धांतों पर लगातार जोर देता आया है पहला, जाति-आधारित अपमान पर शून्य सहनशीलता और दूसरा, जांच प्रक्रिया में पूर्ण निष्पक्षता। आलोचकों का मानना है कि नए UGC नियम पहले सिद्धांत को तो मजबूती देते हैं, लेकिन दूसरे यानी निष्पक्ष और स्पष्ट प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त दिशा-निर्देश नहीं देते।
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इसमें कोई संदेह नहीं कि भेदभाव एक वास्तविक समस्या है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नए UGC नियम मौजूदा कानूनों को और मजबूत करेंगे या फिर पहले से मौजूद ढांचे पर एक अतिरिक्त परत जोड़कर व्यवस्था को और जटिल बना देंगे? जब तक UGC यह स्पष्ट नहीं करता कि पुरानी व्यवस्था क्यों नाकाम रही और नया ढांचा किस तरह व्यावहारिक व संविधान-संगत है, तब तक यह विवाद खत्म होता नहीं दिखता। जिस सुधार के लिए ये नियम लाए गए थे, वही अब खुद पारदर्शिता और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।






