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नवभारत विशेष: मातृत्व की नई परिभाषा गढ़ेगा सुको का फैसला, पितृत्व अवकाश की भी सिफारिश

Adoption Leave Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली महिलाओं को भी 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश देने का ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने तीन महीने की उम्र की शर्त को असंवैधानिक बताया।

  • Written By: अंकिता पटेल
Updated On: Mar 19, 2026 | 07:17 AM

Adoptive Mothers Maternity Leave ( सोर्स: सोशल मीडिया )

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Adoptive Mothers Maternity Leave: देश की सर्वोच्च अदालत ने गोद लिए बच्चे के लिए 12 हफ्ते की छुट्टी का ऐतिहासिक फैसला सुनाया। भारत में अब तक मातृत्व की परिभाषा में सिर्फ जन्म देने वाली मां को ही देखा जाता था। लेकिन बदलते सामाजिक ढांचे के बीच न्यायपालिका ने गोद लिए बच्चे के लिए भी मातृत्व अवकाश का निर्णय सुनाकर, मातृत्व की परिभाषा में व्यापक और ऐतिहासिक विस्तार किया है।

गोद लिए बच्चे को भी अब महिला के वास्तविक बच्चे जैसा ही माना जाएगा, अभी तक तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश की व्यवस्था थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को अमान्य करते हुए कहा, ‘अब किसी भी उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश मिलेगा।’

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर। महादेवन की बेंच ने सोशल सिक्युरिटी कोड-2020 से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए धारा 60 (4) को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को ही गोद लिए जाने पर मातृत्व अवकाश की व्यवस्था थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘गोद लेने बाली मां के लिए तीन महीने की उम्र की शर्त न सिर्फ गलत और भेदभावपूर्ण है बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन है। साल 2017 में हमसानंदनी नंदूरी ने दो बच्चों को गोद लिया था।

साढ़े चार साल की एक लड़की और दो साल के एक लड़के को। लेकिन जब बच्चों को गोद लेने के बाद उसने अपने दफ्तर से मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश की मांग की, तो उसे सिर्फ 6-6 हफ्ते की छुट्टी दी गई, क्योंकि गोद लिए गए ये बच्चे तीन महीने से बड़े थे।

नंदूरी ने इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि 3 महीने की उम्र की शर्त न केवल भेदभावपूर्ण, बल्कि संवैधानिक रूप से भी गलत है। क्योंकि इससे समानता के अधिकार का हनन होता है।

यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मातृत्व अवकाश के साथ-साथ पितृत्व अवकाश को भी महत्वपूर्ण और जरूरी बताया। भारत में अभी तक पितृत्व अवकाश को कानूनी मान्यता नहीं है, जबकि महिलाओं को मैटरनिटी लीव मिलती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व अवकाश की भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे लाया जाना चाहिए और इसके लिए केंद्र सरकार कानून बनाए, सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इस कानून में छुट्टी की अवधि माता-पिता और बच्चे की जरूरत के अनुसार तय होनी चाहिए, सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि बच्चे के शुरुआती विकास में मां और पिता दोनों की ही प्रमुख भूमिका होती हैं।

अब वह जमाना नहीं रहा, जब बच्चे को केवल मां ही पालती है। आजकल बच्चे के लालन-पालन में मां और बाप दोनों की बराबर की भूमिकाएं होती हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह पितृत्व अवकाश की भी व्यवस्था करे।

सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला ऐसे समय पर – आया है, जब एक ओर भारत में मात्तृत्त्व लाभ अधिनियम 1961 के तहत जैविक माताओं को 26 सप्ताह की छुट्टी मिलती है, वहीं गोद लेने वाली माताओं के लिए यह अवकाश को व्यवस्था न सिर्फ सीमित बल्कि काफी हद तक अस्पष्ट थी।

यह भी पढ़ें:-नवभारत निशानेबाज: खून-खराबे से भरा रमजान, पाक के निशाने पर तालिबान

इस निर्णय के बाद अब जैविक और गोद लेने वाली माताओं के बीच का फासला खत्म हो गया है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि मातृत्व केवल जैविक भाव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। ऐसे में शुरुआती समय में बच्चे के साथ माता-पिता विशेषकर मां की उपस्थिति बेहद महत्वपूर्ण है।

पितृत्व अवकाश की भी सिफारिश

गोद लिया गया बच्चा चाहे छोटा हो या बड़ा, उसकी भावनात्मक और विकासात्मक जरूरतें एक जैसी होती हैं। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की यह मान्यता एक नया सामाजिक संकेत दे रही है। भारत में परिवार की अवधारणा तेजी से बदल रही है। न केवल सिंगल पैरेंट्स, लेट मैरिज बल्कि बच्चे को गोद लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है।

लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा

Supreme court adoption maternity leave 12 weeks landmark verdict india

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Published On: Mar 19, 2026 | 07:17 AM

Topics:  

  • Navbharat Editorial
  • Social Security
  • Supreme Court

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