'इंसानों से ज्यादा कुत्तों की फिक्र?' सुप्रीम कोर्ट हैरान, कहा- इतनी अर्जियां तो आदमी के लिए भी नहीं

Supreme Court ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में दायर याचिकाओं की बाढ़ पर हैरानी जताई। जस्टिस मेहता ने कहा कि इंसानों से जुड़े मामलों में भी आमतौर पर इतनी बड़ी संख्या में याचिकाएं नहीं की जाती।
Supreme Court on stray dog petitions
सुप्रीम कोर्ट
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Supreme Court stray dog petitions: देश की सबसे बड़ी अदालत आजकल एक अजीब स्थिति से गुजर रही है। यहां इंसानों से जुड़े मुकदमों से ज्यादा शोर 'आवारा कुत्तों' को लेकर मचा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर हैरानी जताई है। सुनवाई के दौरान जजों ने टिप्पणी की कि आजकल कुत्तों के मामलों में जितनी अर्जियां आ रही हैं, उतनी तो आमतौर पर इंसानों के लिए भी नहीं आतीं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि कोर्ट को यह कहना पड़ा?

यह दिलचस्प वाकया तब हुआ जब जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच सुनवाई कर रही थी। वकीलों ने जैसे ही आवारा कुत्तों का मुद्दा उठाया और अंतरिम आवेदन का जिक्र किया, जस्टिस मेहता बोल पड़े। उन्होंने साफ कहा कि आवेदनों की यह बाढ़ हैरान करने वाली है। हालांकि, कोर्ट ने वकीलों को निराश नहीं किया और आश्वासन दिया कि बुधवार को इस मुद्दे पर विस्तार से बात होगी और सभी पक्षों को सुना जाएगा।

बुधवार को होगा 'बड़ा फैसला'

अब सबकी निगाहें बुधवार पर टिकी हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आवारा कुत्तों से जुड़ी कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी। इसके लिए एक विशेष बेंच तैयार है, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल होंगे। जब एक वकील ने केस ट्रांसफर करने की बात कही, तो कोर्ट ने धैर्य रखने को कहा। शीर्ष अदालत का कहना है कि वे हर वकील की दलील सुनेंगे, लेकिन जिस रफ्तार से ये मामले आ रहे हैं, वह वाकई में सोचने पर मजबूर करता है।

नसबंदी से लेकर हाईवे की सफाई तक

यह सख्ती बेवजह नहीं है। पिछले साल 7 नवंबर 2025 को कोर्ट ने सख्त आदेश दिया था कि स्कूल, अस्पताल और रेलवे स्टेशनों जैसे इलाकों से कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम भेजा जाए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें वापस उसी जगह न छोड़ा जाए। इसके अलावा, हाईवे और एक्सप्रेसवे पर घूमने वाले मवेशियों को हटाने का निर्देश भी दिया गया था। कोर्ट का मानना है कि ऐसे इलाकों में कुत्तों के काटने की घटनाएं प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की विफलता को दर्शाती हैं। दिल्ली में बच्चों में फैलते रेबीज की खबरों पर कोर्ट पहले ही स्वतः संज्ञान ले चुका है।

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