राज्य घाटे में चल रहे फिर भी मुफ्त की स्कीमें चल रहीं...फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दी नसीहत

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने 'फ्रीबीज' यानी मुफ्त सुविधाओं पर कड़ी टिप्पणी की है। CJI ने कहा कि घाटे में चल रहे राज्य मुफ्त भोजन, बिजली और साइकिल जैसी योजनाएं बांट रहे हैं।
Supreme Court CJI remarks on freebies
सुप्रीम कोर्ट (इमेज-सोशल मीडिया)
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Supreme Court on Freebies: सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज (मुफ्त सुविधाओं) पर सख्त टिप्पणी की है और इसे देश की आर्थिक विकास प्रक्रिया के लिए खतरनाक बताया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य वित्तीय घाटे में चल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद मुफ्त सेवाओं का वितरण जारी है। CJI ने यह भी कहा कि ऐसे फिजूलखर्ची से देश के आर्थिक विकास को गंभीर नुकसान हो सकता है।

फ्रीबीज के खतरों पर CJI की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम बनाम केंद्र सरकार मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। CJI ने कहा कि राज्य सरकारें मुफ्त भोजन, साइकिल, बिजली, और अब नकद राशि को सीधे लोगों के खातों में स्थानांतरित कर रही हैं। यह फिजूलखर्ची केवल विकास कार्यों के लिए जरूरी धन को खा रही है। CJI ने कहा कि "कल्पना कीजिए, अधिकांश राज्य राजस्व घाटे में हैं, फिर भी यही नीतियां लागू की जा रही हैं। अगर आप सुबह से ही मुफ्त सुविधाएं देने की शुरुआत कर देते हैं, तो विकास के लिए पैसा कहां से आएगा?" राज्य को यह हलफनामा दाखिल करना चाहिए कि इस खर्च को कहां से पूरा किया जाएगा।

राजस्व घाटे के बावजूद मुफ्त सुविधाएं

CJI ने यह सवाल उठाया कि अगर राज्य घाटे में चल रहे हैं, तो मुफ्त सुविधाएं देने के लिए धन कहां से आएगा? उन्होंने उदाहरण दिया कि राज्य एक साल में जो राजस्व इकट्ठा करते हैं, उसका कम से कम 25 प्रतिशत तो राज्य के विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

फ्रीबीज और राजनीति

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि फ्रीबीज योजनाओं की घोषणा अक्सर चुनावों से ठीक पहले की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों और समाजशास्त्रियों से इसे लेकर पुनर्विचार करने की सलाह दी।

मुफ्त सुविधाओं का वित्तीय प्रभाव

CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि यह पैसा जनता के टैक्स से आता है। अगर राज्य सरकारें मुफ्त सुविधाएं दे रही हैं, तो इनका भुगतान कौन करेगा? उन्होंने यह भी उदाहरण दिया कि कुछ राज्यों में बड़े जमींदारों को भी मुफ्त बिजली दी जाती है, जबकि वे इसे खर्च करने में सक्षम होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर देश के वित्तीय संकट और मुफ्त सुविधाओं के आर्थिक प्रभाव पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

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