मंदिरों के प्रसाद में शराब पर रोक नहीं, सबरीमाला केस में सरकार का बड़ा तर्क; धर्म और परंपरा पर छिड़ी नई बहस

Supreme Court: कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की लगातार तीसरे दिन सुनवाई की। इसमें धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर विचार किया गया।
supreme court hearing on sabarimala case
सुप्रीम कोर्ट, (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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Supreme Court On Sabarimala Case: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगातार तीसरे दिन मंगलवार को भी सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने सुनवाई के दौरान देश के अलग-अलग मंदिरों में लंबे समय से चली आ रही रीति-रिवाजों का जिक्र किया। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रसाद के रूप में मदिरा दी जाती है। कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि मदिरा न दी जाए।

अदालत के सामने एक उदाहरण देता हूं एएसजी ने कहा कि कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है, और अगर कोई व्यक्ति अपनी पसंद या अंतरात्मा की आवाज पर कहता है कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है, तो वह किसी खास संप्रदाय के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि मेरा यह अधिकार है और मुझे यही परोसा जाना चाहिए। उसे उन श्रद्धालुओं के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

'धर्म के नाम पर भेदभाव ठीक नहीं'

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर मंदिरों में प्रवेश को लेकर यह कहा जाए कि सिर्फ एक खास समुदाय ही अंदर आ सकता है। तो यह हिंदू धर्म के लिए सही नहीं होगा। उन्होंने देवरु केस का उदाहरण दिया जहां सिर्फ गौड़ सारस्वत ब्राह्मण को ही मंदिर में आने दिया जाता था। हर व्यक्ति को मंदिर और मठ में जाने का अधिकार होना चाहिए। अगर हर समुदाय अपना-अपना अलग मंदिर बनाकर दूसरों को रोकेगा, तो समाज में दूरी बढ़ेगी। यानी कि धर्म के नाम पर भेदभाव ठीक नहीं है इससे एकता कमजोर होगी।

2018 में 5 जजों की बेंच ने सुनाया था फैसला

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की गुरुवार को लगातार तीसरे दिन सुनवाई की। इसमें विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया गया। धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

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