रेवंत का मास्टरस्ट्रोक: ‘पतंग’ के सहारे बीजेपी का किला ढहाया, ओवैसी से हाथ मिलाकर तेलंगाना में बदली सियासत!
Telangana News : तेलंगाना के नगर निकाय चुनावों ने राजनीति की पटकथा बदली है। रेवंत रेड्डी और ओवैसी की नई सियासी केमिस्ट्री ने न सिर्फ बीआरएस को झटका दिया, बल्कि बीजेपी की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।
- Written By: रंजन कुमार
रेवंत रेड्डी और ओवैसी।
Revanth Reddy and Asaduddin Owaisi Alliance : भारतीय राजनीति का सामान्य दस्तूर है कि सत्ता में आने के बाद एंटी-इन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने इस मिथक को चकनाचूर कर दिया है। विधानसभा और लोकसभा के बाद अब स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने साबित कर दिया है कि राज्य में कांग्रेस का झंडा मजबूती से लहरा रहा है, केसीआर की बीआरएस (BRS) का ‘गुलाबी रंग’ फीका पड़ चुका है और बीजेपी का ‘भगवा’ फिलहाल कांग्रेस की लहर को चुनौती देने में संघर्ष कर रहा है।
इन चुनावों की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली सुर्खी रही रेवंत रेड्डी और असदुद्दीन ओवैसी की नई केमिस्ट्री। कुछ समय पहले तक ये दोनों नेता एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। रेवंत ओवैसी को बीआरएस की बी टीम बताते थे, तो ओवैसी उन्हें आरएसएस का आदमी कहकर हमला करते थे। लेकिन सत्ता के समीकरणों ने पुरानी रंजिशों की जगह नई दोस्ती को जन्म दे दिया है।
बीआरएस के ताबूत में ठोंक दी आखिरी कील
निज़ामाबाद नगर निगम में कांग्रेस के ‘हाथ’ और एमआईएम (AIMIM) की ‘पतंग’ ने मिलकर न केवल बीजेपी का रास्ता रोका, बल्कि बीआरएस के ताबूत में आखिरी कील भी ठोंक दी। यहां बीजेपी 28 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन रेवंत रेड्डी ने मास्टरस्ट्रोक चलते हुए ओवैसी की ओर हाथ बढ़ाया। कांग्रेस के 17 और एमआईएम के 14 पार्षदों ने हाथ मिलाया और बीजेपी के जबड़े से मेयर की कुर्सी छीन ली। कांग्रेस की उमा रानी मेयर बनीं और एमआईएम को डिप्टी मेयर का पद मिला। यह गठबंधन रेवंत की उस पावर पॉलिटिक्स का हिस्सा है, जहां बीजेपी को रोकने के लिए वे विचारधारा और रंजिश को किनारे रखने का दम रखते हैं।
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निकाय चुनावों का कलर कोड और रेवंत का जादू
तेलंगाना में कुल 13 नगर निगम हैं, जिनमें से 7 पर चुनाव हुए। कांग्रेस ने इनमें से 5 पर अपना परचम लहराया है। 116 नगर पालिकाओं में से 80% से अधिक पर कांग्रेस का कब्जा रेवंत रेड्डी की ‘प्रजा-पालना’ (जनता का शासन) नीति पर जनता की मुहर है। वैसे, करीमनगर में बीजेपी ने कांग्रेस और बीआरएस को धूल चटाते हुए अपना मेयर बनाया, जो रेवंत के लिए एक चेतावनी भी है कि हिंदू बहुल शहरी इलाकों में बीजेपी अभी भी एक कड़ी चुनौती बनी हुई है।
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क्या सेकुलर ब्लॉक की तैयारी है?
रेवंत और असदुद्दीन ओवैसी की यह बढ़ती नजदीकी केवल मेयर चुनाव तक सीमित नहीं दिखती। मूसी नदी के सौंदर्यीकरण से लेकर हैदराबाद के विकास तक दोनों अब एक ही पटरी पर हैं। सवाल यह है कि क्या यह 2028 विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए एक नए सेकुलर ब्लॉक की नींव है? यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस का जमीनी कैडर और राहुल गांधी इस गठबंधन को लंबी रेस के लिए मंजूरी देते हैं या यह केवल निकाय चुनाव तक का एक मैरिज ऑफ कन्वेंशन बनकर रह जाएगा।
