पहले अखिलेश फिर कांग्रेस और अब मायावती ने दिखाया ठेंगा, कटी पतंग हुए ओवैसी! यूपी में घुसने से पहले ही लगा ताला
UP Politics: यूपी में 2027 के संग्राम से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के लिए सियासी राह पथरीली नजर आ रही हैं। सूबे के दो बड़े धुरंधर- मायावती और अखिलेश ने ओवैसी की 'पतंग' उड़ने से पहले ही काट दी है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
असदुद्दीन ओवैसी, फोटो- नवभारत डिजाइन
Uttar Pradesh Assembly Elections 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही सूबे की सियासी बिसात बिछने लगी है, लेकिन इस बिसात पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। बिहार और महाराष्ट्र में चुनावी सफलता का स्वाद चखने के बाद ओवैसी की नजरें यूपी की 200 सीटों पर टिकी हैं।
एक तरफ जहां ओवैसी बसपा के साथ मिलकर ‘दलित-मुस्लिम’ गठजोड़ बनाने का सपना संजोए बैठे थे तो वहीं दूसरी ओर मायावती ने गठबंधन की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए ‘एकला चलो’ की नीति का ऐलान किया है। अखिलेश यादव ने ओवैसी के प्रति तल्ख तेवर दिखाते हुए उनकी एंट्री को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।
मायावती की दो टूक: ‘नहीं करेंगे गठबंधन’
आज यानी 18 फरवरी को बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक ही झटके में इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लखनऊ में प्रेस वार्ता के दौरान मायावती ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि उनकी पार्टी किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी, क्योंकि गठबंधन से हमेशा बसपा को ही नुकसान उठाना पड़ता है।
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मायावती की यह घोषणा ओवैसी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि उनके प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली लगातार बसपा के साथ गठबंधन की पैरवी कर रहे थे। मायावती ने न केवल गठबंधन से इनकार किया, बल्कि अपने समर्थकों को यह चेतावनी भी दे दी कि चुनाव करीब आते ही ऐसे ‘फेक’ दावे और बढ़ेंगे जिनसे अंबेडकरवादियों को सावधान रहने की जरूरत है।
‘पीडीए’ को साधने में लगी है सपा, नहीं थामेगी दामन
उधर, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का रुख भी कुछ अलग नहीं है। जब उनसे ओवैसी की एंट्री पर सवाल किया गया, तो उन्होंने बेहद तंजिया लहजे में कहा कि वह ‘साइकिल’ पर सवार होकर आएंगे। अखिलेश के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि सपा अपने 90 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक में किसी भी प्रकार की सेंधमारी बर्दाश्त नहीं करेगी और ओवैसी को गठबंधन में कोई जगह नहीं मिलने वाली है।
अखिलेश-ओवैसी के बीच कहां फंसी है बात?
इस सियासी रस्साकशी के पीछे की असल वजह उत्तर प्रदेश का 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता है, जो राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। साल 2017 के विधानसभा चुनावों का कड़वा अनुभव सपा और बसपा दोनों को याद है, जहां मुस्लिम वोट के विभाजन के कारण भाजपा ने 82 मुस्लिम बहुल सीटों में से 62 पर कब्जा कर लिया था।
वहीं, 2022 में ओवैसी की मौजूदगी ने मुरादाबाद, बिजनौर और सहारनपुर जैसे इलाकों में सपा के समीकरण बिगाड़ दिए थे, जिससे अखिलेश कई सीटें मामूली अंतर से हार गए थे। इसी जोखिम को कम करने के लिए सपा ने अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे पुराने दिग्गजों को साथ लेकर अपने किले को मजबूत करना शुरू कर दिया है।
खरगे और मसूद के बीच ‘हैदराबाद वाली’ बातचीत
हाल ही में मल्लिकार्जुन खरगे का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है। वीडियो में कांग्रेस अध्यक्ष संसद परिसर में पार्टी सांसद इमरान मसूद से कहते नजर आ रहे हैं कि “हैदराबादी परेशानी को उत्तर प्रदेश में मत घुसने दो, वरना वो खुद भी डूबेगी और हमें भी डुबो देगी।” इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर हलचल बढ़ गई है और कई यूजर्स इसे असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एआईएमआईएम से जोड़कर देख रहे हैं।
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शेरवानी, बिरयानी और परेशानी: ऐसा क्यों बोल गए खरगे?
वीडियो में खरगे यह भी कहते दिख रहे हैं कि “हैदराबाद शहर तीन चीजों के लिए मशहूर है- शेरवानी, बिरयानी और परेशानी।” हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सोशल मीडिया पर यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि इशारा ओवैसी और उनकी पार्टी की ओर हो सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में विपक्षी वोटों के बंटवारे की आशंका को लेकर सतर्क दिख रही है।
इससे साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस ने भी ओवैसी को ‘परेशानी’ करार देकर अपने इरादे साफ कर दिए हैं, जिससे अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ओवैसी अकेले दम पर यूपी की राजनीति में कोई करिश्मा कर पाएंगे या फिर विपक्ष की यह घेराबंदी उनकी ‘ग्रैंड एंट्री’ के सपने को चकनाचूर कर देगी।
