
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, (सोर्स- सोशल मीडिया)
President Droupadi Murmu: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस का पावन पर्व हमें हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य में देश की दशा और दिशा का अवलोकन करने का अवसर देता है। स्वतंत्रता संग्राम के बल पर 15 अगस्त 1947 के दिन हमारे देश की दशा बदली। भारत स्वाधीन हुआ और हम अपनी राष्ट्रीय नियति के निर्माता बने।
राष्ट्रपति मुर्मू बोलीं कि 26 जनवरी 1950 से हमने अपने गणतंत्र को संवैधानिक आदर्शों की दिशा में आगे बढ़ाना प्रारंभ किया। इसी दिन हमारा संविधान पूरी तरह लागू हुआ। लोकतंत्र की जननी भारत भूमि उपनिवेशवादी शासन के विधि-विधान से मुक्त हुई और हमारा लोकतांत्रिक गणराज्य अस्तित्व में आया।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हमारा संविधान विश्व इतिहास के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य का आधार ग्रंथ है। संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श हमारे गणतंत्र को परिभाषित करते हैं। यही आदर्श संविधान निर्माताओं की भावना और देश की एकता का मजबूत आधार हैं। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती देशवासियों ने उत्साहपूर्वक मनाई। उनकी 150वीं जयंती के पावन अवसर से जुड़े स्मरणोत्सव आज भी मनाए जा रहे हैं। ऐसे उत्सव देशवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना को और मजबूत करते हैं।
उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हमारी प्राचीन सांस्कृतिक एकता का ताना-बाना हमारे पूर्वजों ने बुना है। यही सांस्कृतिक एकता आज भी हमारे लोकतंत्र को जीवंत बनाए हुए है और प्रत्येक भारतीय को जोड़ती है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि पिछले साल 7 नवंबर से हमारे राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की रचना के 150 साल पूर्ण होने के उत्सव भी मनाए जा रहे हैं। भारत माता के स्वरूप की वंदना का यह गीत जन-जन में राष्ट्रप्रेम का संचार करता है। राष्ट्रीयता के महाकवि सुब्रमण्य भारती ने तमिल भाषा में ‘वंदे मातरम्’ के भावार्थ पर आधारित रचना कर इस भावना को और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
इस प्रकार वंदे मातरम् की भावना को जनमानस से और गहराई से जोड़ा गया। अन्य भारतीय भाषाओं में भी इस गीत के अनुवाद लोकप्रिय हुए। श्री अरबिंदो ने वंदे मातरम् का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। मूल रूप से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् हमारी राष्ट्र-वंदना का प्रतीक है।
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इस राष्ट्र-वंदना के शौर्य और गौरव को दो दिन पहले, यानी 23 जनवरी को, देशवासियों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित करके स्मरण किया। वर्ष 2021 से नेताजी की जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है, ताकि देशवासी, विशेषकर युवा वर्ग, उनकी अदम्य देशभक्ति से प्रेरणा प्राप्त कर सकें। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का दिया हुआ नारा ‘जय हिंद’ हमारे राष्ट्र गौरव का उद्घोष है।






