मुंबई: भारत के कानून में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सुप्रीम कोर्ट में न्याय की देवी की प्रतिमा से आंखों पर लगी पट्टी हटा दी गई है। मतलब साफ है कि अब भारत का कानून अंधा नहीं है। न्याय की देवी के हाथ में तलवार थी, उसे हटाकर अब संविधान की किताब रख दिया गया है। जबकि न्याय की देवी के हाथ का तराजू अभी बरकरार है, जो इंसाफ का प्रतीक हुआ करता था, वह अब भी उनके हाथ में मौजूद दिखाई दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में न्याय की देवी की मूर्ति में हुए इस बदलाव पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इस बदलाव से खुश हैं जबकि कुछ सवाल पूछ रहे हैं कि खुली आंख का क्या मतलब है, क्या अब न्याय की देवी वारदात के समय घटनास्थल को देख सकेंगी। आखिरकार इसीलिए तो उनकी आंख पर पट्टी लगाई गई थी कि घटनास्थल पर मौजूद न होते हुए भी वह इंसाफ करती हैं। उनके हाथ में तलवार इसलिए थी कि इंसाफ की देवी सजा भी देती है, तलवार सजा का प्रतीक थी। तराजू इंसाफ का प्रतीक था जो अभी बरकरार है। वही आंखों पर पट्टी इस बात की तस्दीक करती थी कि न्याय की देवी घटनास्थल पर बिना मौजूद हुए भी इंसाफ करती हैं।
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न्याय की देवी के हाथ में संविधान की किताब पर लोगों ने खुशी जाहिर की है, जबकि तराजू अब भी इंसाफ का प्रतीक बना हुआ है और सजा संविधान के हिसाब से दी जाती है इसलिए संविधान की किताब भी ठीक है, लेकिन आंखों से पट्टी हटाए जाने पर लोग नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर कुछ लोग इस बदलाव से बेहद खुश नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि भारत का कानून पहले अंधा था। लेकिन अब यह अंधा नहीं है, मतलब साफ है कि इससे दुनिया भर में एक संदेश जाएगा कि भारत में अब कानून को लेकर भी बड़े बदलाव किए जा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सैकड़ों फिल्मों में कानून के अंधा होने की दुहाई दी गई। अंधा कानून नाम से फिल्म भी बनी। पुरानी फिल्मों में डायलॉग हुआ करता था, कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन कानून अंधा है। अब इस तरह की डायलॉग बाजी नई फिल्मों में नजर नहीं आएगी, क्योंकि अब भारत का कानून अंधा नहीं रहा।