Kargil War: चोरबाट ला युद्ध के नायकों को भारतीय सेना ने दी श्रद्धांजलि, याद किया कारगिल का गौरवशाली इतिहास
Kargil War 1999 Update: भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने कारगिल युद्ध के नायकों को याद करते हुए दिवंगत कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के जवानों की वीरता को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
- Written By: स्निग्धा श्रीवास्तव
कारगिल युद्ध (सोर्स- सोशल मीडिया)
Kargil War 1999, Memorial: हमारे देश के वीर सैनिकों ने आज के दिन (30 मई) भारत के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा था। आज वही दिन है जब भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए हमले तेज कर दिए थे। जी हां 30 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान चोरबाट ला की लड़ाई में भारत के जांबाज सैनिकों ने दुश्मन का सफाया कर इतिहास के पन्नो में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया।
भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने दिवंगत कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के जवानों की वीरता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 30 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान बटालिक सेक्टर में हुई चोरबाट ला की लड़ाई में उनके अदम्य साहस और पराक्रम को याद किया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X साझा किए पोस्ट में कॉर्प्स ने कर्नल सोनम वांगचुक के उस कथन को याद किया जिसमें उन्होंने कहा था कि चोरबाट ला में मैंने जो किया, वह मेरा कर्तव्य था, कोई असाधारण कार्य नहीं। पोस्ट के माध्मय से सेना ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी कर्नल सोनम ने मोर्चे से आगे बढ़कर नेतृत्व किया, जो ‘ऑपरेशन विजय’ में भारत की एक महत्वपूर्ण शुरुआती सफलता साबित हुई।
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गर्व और कृतज्ञता के साथ याह किए जाते है मेजर सोनम वांगचुक
सेना की पोस्ट में आगे कहा गया, “मेजर सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के बहादुर सैनिकों ने बटालिक सेक्टर में चोरबाट ला की लड़ाई के दौरान इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिया। शून्य से भी नीचे के तापमान, बर्फीले तूफानों, दुश्मन की गोलाबारी और दुर्गम इलाकों का सामना करते हुए, मेजर वांगचुक ने मोर्चे से आगे बढ़कर नेतृत्व किया। उन्होंने सोनम-1 और सोनम-2 में निगरानी चौकियां स्थापित कीं और दुश्मन का सफाया किया। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिकों को लद्दाख पर्वत श्रृंखला की रिजलाइन पर नियंत्रण स्थापित करने से रोक दिया। भारत उन्हें गर्व और कृतज्ञता के साथ याद करता है।”
‘स्नो वॉरियर्स’ने चलाया ‘ऑपरेशन विजय’
बेहद ऊंची चोटियों और बर्फीले इलाकों में लड़ी गई चोरबाट ला की लड़ाई कारगिल युद्ध के दौरान घुसपैठियों द्वारा कब्जा किए गए रणनीतिक ठिकानों को पुनः हासिल करने के लिए भारत द्वारा चलाए गए व्यापक ‘ऑपरेशन विजय’ का हिस्सा थी। ‘स्नो वॉरियर्स’ के नाम से प्रसिद्ध लद्दाख स्काउट्स ने इस अभियान के दौरान ऊंची हिमालयी युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और एलओसी के साथ दुनिया की सबसे कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में अभियान को चलाया।
60 डिग्री सेल्सियस तक के कठोर मौसम और पतली हवा के बीच चला अभियान
आधिकारिक जानकारी के अनुसार मई 1999 के पहले सप्ताह में, कारगिल और द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों द्वारा भारी घुसपैठ का पता चला था। जिसके बाद लद्दाख स्काउट्स उन पहली इकाइयों में शामिल थी जिन्हें बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया था। जिसने प्रमुख पर्वतीय रिजलाइनों से दुश्मन को खदेड़ने के लिए कई हमले और टोही अभियान चलाए। यह अभियान अक्सर 18,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर भारी तोपखाने की गोलाबारी और 60 डिग्री सेल्सियस तक के कठोर मौसम और पतली हवा के बीच संचालित किया गया।
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इस क्षेत्र में मेजर वांगचुक की कार्रवाइयों को भारत के लिए शुरुआती सामरिक सफलताएं सुनिश्चित करने का श्रेय दिया जाता है। बटालिक क्षेत्र में रिजलाइनों पर नियंत्रण, नियंत्रण रेखा के साथ आने-जाने वाले मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
महावीर चक्र से किए गए सम्मानित
भारतीय सेना के एक सम्मानित अधिकारी और लद्दाख की सबसे प्रतिष्ठित सैन्य हस्तियों में से एक कर्नल सोनम वांगचुक को ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान उनके असाधारण साहस के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। ‘लायन ऑफ लद्दाख’ के नाम से प्रसिद्ध कर्नल वांगचुक को 1999 के कारगिल युद्ध में उनके निर्भीक नेतृत्व के लिए याद किया जाता है। विशेष रूप से बटालिक सेक्टर में चोरबाट ला की लड़ाई के दौरान उनके साहसिक कार्यों के लिए, जो भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बन चुके हैं। बता दें कि कर्नल सोनम वागंचुक का निधन 10 अप्रैल 2026 को हार्ट अटैक से हो गया था। सेना में आज भी उनके योगदान को सम्मान की नजर से देखा जाता है।
कारगिल युद्ध 1999
ज्ञात हो कि 30 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना ने घुसपैठियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के तहत अपने हमले तेज कर दिए थे। दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सामरिक बढ़त हासिल करने के लिए अत्याधुनिक मिराज-2000 लड़ाकू विमानों को आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया था। कारगिल युद्ध को ऑपरेशन विजय भी कहा जाता है। मई 1999 के पहले सप्ताह में, कारगिल और द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों द्वारा भारी घुसपैठ का पता चला था। कारगिल युद्ध में मेजर राजेश सिंह अधिकारी जैसे जांबाजों ने तोलोलिंग में अदम्य साहस दिखाते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
