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भारत में पहली बार होगी डिजिटल जनगणना, 2027 में बदल जाएंगे ये पुराने तरीके, जानें फायदे और चुनौतियां
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
Digital Census in India: गृह मंत्रालय ने कहा है कि 2027 की जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी और डेटा मोबाइल ऐप से एकत्र होगा। यह भारत की 16वीं जनगणना होगी, और दुनिया के लिए एक नया मानक स्थापित कर सकती है।

भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना 2027 में, फोटो- सोशल मीडिया
Digital Census Pros And Cons: भारत में 2027 में जनगणना आयोजित की जाएगी, जो पहली बार पूरी तरह डिजिटल माध्यम से होगी। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में इसकी पुष्टि की। यह महत्वाकांक्षी प्रयास भारत को दुनिया की सबसे तेज, सबसे बड़ी और आधुनिक डिजिटल जनगणना का मानक स्थापित करने में मदद कर सकता है।
2027 की जनगणना भारत की 16वीं जनगणना होगी, जिसे कोविड-19 महामारी, चुनाव और प्रशासनिक देरी के कारण 2021 से टाल दिया गया था। गृह मंत्रालय ने पुष्टि की है कि डेटा कलेक्शन मोबाइल ऐप के माध्यम से किया जाएगा। यह कदम भारत को अमेरिका, ब्रिटेन और घाना जैसे उन देशों की श्रेणी में ला खड़ा करता है, जिन्होंने डिजिटल या हाइब्रिड जनगणनाएं पहले ही कर ली हैं।
जनगणना दो स्टेप्स में पूरी की जाएगी:
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चरण 1: घर सूचीकरण (लिस्टिंग) और हाउस मैपिंग, जो अप्रैल से सितंबर 2026 तक चलेगा।
चरण 2: जनसंख्या गणना, जो फरवरी-मार्च 2027 में होगी (बर्फीले क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान होंगे)।
इनुमरेटर करेंगे स्मार्टफोन का इस्तेमाल
डिजिटल प्रक्रिया के तहत, गणनाकारक (इनुमरेटर) पारंपरिक कागजी फॉर्म के बजाय अपने स्मार्टफोन (एंड्रॉयड/आईओएस) पर ऐप का उपयोग करेंगे। जनता वेब पोर्टल के माध्यम से स्वयं-जनगणना (सेल्फ-इनुमरेशन) भी कर सकेगी। यह ऐप 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा। साथ ही, कनेक्टिविटी की समस्या वाले क्षेत्रों के लिए कागजी फॉर्म का बैकअप भी रखा जाएगा, जिससे यह हाइब्रिड फॉर्मेट में काम करेगी। इस जनगणना में स्वतंत्र भारत में पहली बार एससी/एसटी के अलावा अन्य जातियों का डेटा भी एकत्र किया जाएगा।
डिजिटल प्रक्रिया के फायदे और जोखिम
डिजिटल तरीकों से भारत उन समस्याओं को दूर कर सकता है जो कागज आधारित प्रक्रिया को धीमा और त्रुटिपूर्ण बनाती थीं। डिजिटल जनगणना का एक बड़ा फायदा तेज डेटा उपलब्धता है। जहां 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़े आने में कई साल लगे थे, वहीं डिजिटल प्रक्रिया से प्रारंभिक आंकड़े 10 दिनों में और अंतिम आंकड़े 6-9 महीनों में उपलब्ध होने की उम्मीद है। इस तेजी से उपलब्ध डेटा का उपयोग 2029 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, फंड आवंटन और जनकल्याण कार्यक्रमों की सटीक योजना में सीधे किया जा सकेगा। इसके अलावा, गणनाकर्मी अपने ही स्मार्टफोन का उपयोग करेंगे, जिससे लाखों टैबलेट खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी और लागत में कमी आएगी।
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इसमें क्या होगा बड़ा चैलेंज?
हालांकि, यह प्रयास चुनौतियों से भरा है। देश में लगभग 65% आबादी ऑनलाइन है, लेकिन पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में सीमित इंटरनेट उपलब्धता के कारण डिजिटल डिवाइड की चुनौती है। इसके अलावा, तीन मिलियन से अधिक गणनाकर्मियों को नई तकनीक पर गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। एक प्रमुख चिंता साइबर सुरक्षा और गोपनीयता की है। जाति, प्रवास इतिहास जैसी व्यक्तिगत सूचनाएं यदि निजी स्मार्टफोन पर स्टोर होकर भेजी जाएंगी, तो डेटा लीक और साइबर हमलों का जोखिम बना रहेगा, जिसके लिए सरकार को एन्क्रिप्शन पर विशेष ध्यान देना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल जनगणना ‘भविष्य में कदम रखने’ जैसा है, लेकिन यह ‘जोखिम भरा एक्सपेरिमेंट’ भी हो सकता है।
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