
पूर्व VP हामिद अंसारी (Image- Social Media)
Hamid Ansari Controversial Statement: देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं। मध्यकालीन इतिहास पर टिप्पणी करते हुए अंसारी ने कहा कि गजनी और लोदी हिंदुस्तानी लुटेरे थे और वे बाहर से नहीं आए थे। उन्होंने कहा कि किताबों में कोई खुद को लोदी बताता है तो कोई गजनी, लेकिन असल में ये सभी हिंदुस्तानी थे।
हामिद अंसारी ने आगे कहा कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार इतिहास को पेश किया जाता है और यह कहा जाता है कि किसने क्या तोड़ा। उनके मुताबिक, सब यहीं के थे और उन्हें विदेशी बताना एक राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा है।
हामिद अंसारी के इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा विरोध जताया है। भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उससे जुड़े तथाकथित इकोसिस्टम लगातार मध्यकालीन इतिहास को अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार पेश कर रहे हैं।
भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि यह कोई पहली बार नहीं है जब अंसारी इस तरह की टिप्पणी कर रहे हों। उन्होंने कहा, “शरजील इमाम और उमर खालिद को युवा नेता बताने के बाद अब कांग्रेस इकोसिस्टम और हामिद अंसारी महमूद गजनवी जैसे शासक का महिमामंडन कर रहे हैं, जिसने सोमनाथ मंदिर को नष्ट और अपवित्र किया था।” पूनावाला ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस से जुड़े लोग सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का विरोध करते हैं और औरंगजेब जैसे शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों को कमतर दिखाने की कोशिश करते हैं।
भाजपा ने अंसारी के उस बयान पर भी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि लोदी और गजनवी विदेशी नहीं थे और उन्हें बाहरी बताना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है। भाजपा का कहना है कि इस तरह के बयान इतिहास के स्थापित तथ्यों के खिलाफ हैं और हिंदू धार्मिक स्थलों पर हुए हमलों को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, महमूद गजनवी गजनवी साम्राज्य का शासक था, जिसकी राजधानी वर्तमान अफगानिस्तान में थी। उसने 10वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप पर कई आक्रमण किए, जिन्हें मुख्य रूप से लूट और विस्तार के उद्देश्य से किया गया माना जाता है। कई ऐतिहासिक स्रोतों में मंदिरों के विध्वंस का उल्लेख मिलता है, जिनमें सोमनाथ मंदिर प्रमुख है। गजनवी ने भारत में स्थायी शासन स्थापित नहीं किया और उसका सत्ता केंद्र उपमहाद्वीप के बाहर ही रहा।
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वहीं, लोदी वंश 1451 से 1526 तक दिल्ली सल्तनत का अंतिम शासक रहा। इसकी स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। लोदी शासकों को आमतौर पर अफगान मूल का माना जाता है। उन्होंने उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया, लेकिन इतिहासकारों के अनुसार उनकी सत्ता स्थापना विजय अभियानों के जरिए हुई थी, इसलिए उन्हें विदेशी मूल का शासक माना जाता है।






