गौरी लंकेश जन्मदिवस विशेष (सोर्स-डिज़ाइन)
Gauri Lankesh, a courageous Indian journalist and activist: गौरी लंकेश भारतीय पत्रकारिता का वह नाम हैं जिन्होंने निर्भीकता को अपना आभूषण बनाया और हमेशा शोषितों की आवाज बनीं। उनके जन्मदिन पर हम उनके संघर्षपूर्ण जीवन और सामाजिक बदलाव के प्रति उनके अडिग समर्पण को याद करते हैं। साहसी भारतीय कार्यकर्ता पत्रकार का जीवन को समझने के लिए उनका व्यक्तित्व एक उत्कृष्ट और प्रेरणादायक उदाहरण पेश करता है। उन्होंने कभी भी सत्ता के सामने झुकना नहीं सीखा और अपनी अंतिम सांस तक सत्य का ही साथ दिया।
गौरी लंकेश ने अपने पिता पी. लंकेश के निधन के बाद ‘लंकेश पत्रिका’ के संपादक का पद संभाला था। शुरुआत में उन्हें कन्नड़ भाषा लिखने और बोलने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि उनकी शिक्षा अंग्रेजी में हुई थी। उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी “अनाड़ी कन्नड़” में संपादकीय लिखकर धीरे-धीरे इस भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई।
पिता की विरासत को संभालते समय उन्होंने कई कर्मचारियों के इस्तीफे और पाठकों की आलोचनाओं का सामना किया। वे अपने पिता की मेज पर बैठने से बचती थीं और उन्होंने अपने डेस्क को उनके बगल में एक स्मारक की तरह रखा। उन्होंने विज्ञापन स्वीकार न करने की परंपरा जारी रखी और हमेशा समाज के दबे-कुचले वर्गों का साथ दिया।
गौरी लंकेश केवल एक संपादक ही नहीं थीं बल्कि वे एक सक्रिय कार्यकर्ता पत्रकार के रूप में उभरीं। बाबा बुदनगिरी आंदोलन में उनकी भागीदारी ने उन्हें कर्नाटक की जमीनी समस्याओं और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति और भी जागरूक किया। उन्होंने एलजीबीटीक्यू अधिकारों और ट्रांसजेंडर समुदाय के उत्थान के लिए अपनी पत्रिका को एक सशक्त मंच बनाया।
वे मानती थीं कि पत्रकारिता और सक्रियता को अलग रखना हमेशा संभव नहीं होता है और उन्होंने सड़क पर उतरकर संघर्ष किया। बाबा बुदनगिरी की पहाड़ियों पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने उन्हें पूरी तरह से एक “कार्यकर्ता-पत्रकार” में बदल दिया था। उन्होंने जेल जाने से भी गुरेज नहीं किया और वहां से भी मोबाइल के जरिए अपना काम जारी रखा।
गौरी लंकेश का व्यक्तित्व अत्यंत सरल लेकिन विचारों से बहुत स्पष्टवादी था जो उन्हें दूसरों से अलग बनाता था। उन्होंने कई बार कट्टरपंथी समूहों से धमकियों और अपमान का सामना किया लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी सुरक्षा की परवाह नहीं की। उनके लेखों ने अक्सर शक्तिशाली लोगों को नाराज किया लेकिन वे अपनी मानवीय प्रतिबद्धता पर अडिग रहीं।
उन्होंने दक्षिणपंथ के उदय का कड़ा विरोध किया और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए लगातार अपनी आवाज बुलंद की। वे मानती थीं कि एक महिला होना कभी-कभी उनकी सुरक्षा के लिए काम करता है क्योंकि लोग महिलाओं को गाली देने से डरते हैं। हालांकि उन्होंने शारीरिक हमलों की आशंकाओं को हमेशा खारिज किया और निर्भीक होकर अपना काम करती रहीं।
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गौरी लंकेश की साहसी पत्रकारिता के कारण वे कई कट्टरपंथी समूहों की आंखों में खटकने लगी थीं। साल 2017 में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई जिसने पूरे देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया। उनकी मृत्यु के बाद भी न्याय की लड़ाई जारी है और उनके चाहने वाले उन्हें एक शहीद के रूप में याद करते हैं।
रोलो रोमिग की पुस्तक “आई एम ऑन द हिट लिस्ट” उनके जीवन की परिस्थितियों पर प्रकाश डालती है। यह पुस्तक उनके जीवन के संघर्षपूर्ण पहलुओं को दुनिया के सामने लाती है। गौरी लंकेश की विरासत उन सभी पत्रकारों को प्रेरित करती है जो सच लिखना चाहते हैं।