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जन्मदिन विशेष: दक्षिण का वो ‘दबंग’ नेता…जिसे विरासत में मिली सियासत, CM की कुर्सी पर बैठकर बन गया सबसे बड़ी पार्टी के लिए चैलेंज
आज यानी शनिवार को एक ऐसे ही सियासतदान का जन्मदिन है, जिसने पिता से राजनीतिक का ककहरा सीखकर न केवल उनकी विरासत संभाली बल्कि राज्य की सत्ता के उत्तुंग शिखर पर जा बैठा।
- Written By: अभिषेक सिंह

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: भारतीय राजनीति में तमाम ऐसी सियासतदान हुए है जिन्हें विरासत में पार्टी ही नहीं सत्ता तक मिल चुकी है। लेकिन उनमें से दो-चार नाम ही ऐसे हैं, जिन्होंने विरासत को सही न केवल सही तरीके से संभाला है बल्कि यह साबित किया है कि ‘नेपोटिज्म’ जैसा शब्द उनके लिए नहीं बना है। आज यानी शनिवार को एक ऐसे ही सियासतदान का जन्मदिन है, जिसने पिता से राजनीतिक का ककहरा सीखकर न केवल उनकी विरासत संभाली बल्कि राज्य की सत्ता के उत्तुंग शिखर पर जा बैठा।
जी हां! आज यानी शनिवार 1 मार्च को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का 72वां जन्मदिन है। आपको बता दें कि एमके स्टालिन तमिलनाडु के पूर्व सीएम डीएमके के दिग्गज नेता एम. करुणानिधि के बेटे हैं। स्टालिन की छवि शुरू से ही ‘दबंग’ रही है और वर्तमान में वह डीएमके के सर्वोच्च नेता हैं। स्टालिन जो कहते हैं डीएमके पार्टी में वही होता है। स्टालिन को सियासत पिता से विरासत में ज़रूर मिली लेकिन आज वह जिस सीएम की कुर्सी सुशोभित हैं उसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है।
पिता से सीखा राजनीति का ककहरा
एम के स्टालिन ने महज 14 साल की उम्र में ही पिता करुणानिधि से राजनीति को समझना शुरू कर दिया था। जिसका असर भी साफ झलक रहा है। स्टालिन ने 1967 के चुनावों के दौरान पहली बार अपनी पार्टी के लिए प्रचार किया। उन्होंने अपने पिता की पार्टी के लिए कड़ी मेहनत की। जिसका नतीजा यह हुआ कि साल 1973 में स्टालिन को डीएमके की जनरल कमेटी का हिस्सा बनाया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और मद्रास विश्वविद्यालय के प्रेसीडेंसी कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री हासिल की।
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क्यों रखा गया ‘स्टालिन’ नाम
रूस के ‘तानाशाह’ जोसेफ स्टालिन की मृत्यु 05 मार्च 1953 को हुई थी। इससे ठीक 4 दिन पहले यानी 01 मार्च को करुणानिधि के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। जिसका नाम अभी तक नहीं रखा गया था। ऐसे में जब करुणानिधि को पता चला कि रूस के तानाशाह ‘स्टालिन जोसेफ’ की मृत्यु हो गई है, तो उन्होंने अपने बच्चे का नाम ‘एमके स्टालिन’ रखा। ‘स्टालिन’ का मतलब ‘लौह पुरुष’ होता है। जिसे फिलहाल स्टालिन सार्थक करते नज़र आ रहे हैं।
तमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन (सोर्स- सोशल मीडिया)
यूं शुरू हुआ राजनीतिक सफर
साल 1975 में युवा नेता मीसा आंदोलन में गिरफ्तार हुईं। जेल में उस युवा नेता के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया। जेल जाने से पहले जिस युवा नेता को उसके पिता के नाम से जाना जाता था, जेल से बाहर आने के बाद वह पूरे राज्य में अपने नाम से ही जाना जाने लगा। लोग इस युवा नेता का सम्मान करने लगे और वह लोगों के लिए हीरो बन गया था। इस युवा नेता का नाम एमके स्टालिन था। जेल से बाहर आने के बाद स्टालिन को जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन स्टालिन हमेशा लोगों के बीच रहे। साल 2018 में अपने पिता करुणानिधि की मौत के बाद वे डीएमके के अध्यक्ष बने और वर्तमान में भी उसी पद पर हैं।
डीएमके पार्टी के सर्वोच्च नेता
स्टालिन करुणानिधि के तीसरे बेटे थे। स्टालिन के उनसे बड़े दो और भाई थे। जिनके नाम एम.के. मुथु और एम.के. अलागिरी थे। इन तीनों भाइयों के बीच पार्टी और पिता करुणानिधि का उत्तराधिकारी बनने को लेकर जंग चल रही थी। साल 2013 में करुणानिधि ने स्टालिन को अपना भविष्य चुना और घोषणा की कि उनके बाद स्टालिन ही पार्टी की कमान संभालेंगे। इस घोषणा के बाद एम.के. मुथु और एम.के. अलागिरी को पार्टी से निकाल दिया गया और स्टालिन ने पूरी पार्टी पर राज करना शुरू कर दिया।
जनता का अभिवादन करते हुए एम के स्टालिन (सोर्स- सोशल मीडिया)
सियासी पटखनी देने में माहिर
स्टालिन ने साल 1984 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा था। इस दौरान उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद स्टालिन ने 1989, 1996, 2001 और 2006 के विधानसभा चुनाव इसी विधानसभा क्षेत्र से जीते। फिर साल 2011 और 2016 में उन्होंने कोलाथुर विधानसभा से चुनाव लड़ा और दोनों बार जीत हासिल की। वे 1996 से 2000 तक चेन्नई के मेयर भी रहे।
तमिलनाडु के पहले डिप्टी सीएम
स्टालिन तमिलनाडु के इतिहास में एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने डिप्टी सीएम का पद संभाला। साल 2009 में जब वे राज्य के डिप्टी सीएम बने तो उनके चाहने वालों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। वे 29 मई 2009 से 15 मई 2011 तक तमिलनाडु के पहले उपमुख्यमंत्री के पद पर रहे। इसके बाद 2021 में उन्होंने पार्टी को बहुमत दिलाया और राज्य के आठवें मुख्यमंत्री बन गए।
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बीजेपी के लिए सबसे बड़ा चैलेंज
सीएम बनने के बाद एम के स्टालिन की ताकत में और ज्यादा इजाफा हुआ। इस समय दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी यानी बीजेपी के लिए दक्षिण में डीएमके और एम के स्टालिन सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर देखे जाते हैं। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि बीजेपी का एमके स्टालिन के रहते हुए तमिलनाडु में सेंध लगा पाना बेहद मुश्किल है।
Dabangg leader of south who inherited politics became a challenge for the biggest party mk stalin
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