दादाभाई नौरोजी (सौजन्यः सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: देश आज यानी बुधवार 4 सितंबर को दादाभाई नौरोजी की 199वीं जयंती मना रहा है। दादाभाई नौरोजी को महात्मा गांधी से पहले देश का सबसे बड़ा नेता माना जाता था। उनके भाषणों में स्वराज के जिक्र से से ही स्वतंत्रता आंदोलन का पौधरोपण हुआ। दादाभाई नौरोजी भारत को आजाद होते हुए भले ही नहीं देख पाए, लेकिन आजाद भारत आज भी उन्हें और उनके योगदान को याद करता है।
दादाभाई नौरोजी जो ब्रिटिश कालीन में भारत के एक पारसी बुद्धिजीवी, शिक्षाशास्त्री, कपास के व्यापारी तथा आरंभिक राजनीतिक और सामाजिक नेता थे। उनका जन्म 4 सितंबर 1825 को हुआ था। वह साल 1892 से 1895 तक यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य (एम पी) थे। इनकी मृत्यु 30 जून साल 1917 में हुई थी, लेकिन आज भी वह लोगों के दिलों पर राज करते हैं।
दादाभाई नौरोजी के पिता का नाम नौरोजी पलांजी डोरडी था और उनकी मां का नाम मनेखबाई था। उनके पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। जिसके बाद 4 साल की उम्र से ही उनकी मां ने अकेले ही उनका पालन-पोषण किया। भले ही उनकी मां अनपढ़ थीं, लेकिन उन्हें पढ़ाई की अहमियत पता थी। वह इसलिए नौरोजी की पढ़ाई का विशेष ध्यान रखती थी।
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मुंबई के एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट से पढ़ाई पूरी करने के बाद 27 साल की उम्र में ही नौरोजी ने गणित, भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक बन गए। जिस एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट से पढ़ाई पूरी की उसी एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में वह कॉलेज में अध्यापक के तौर पर नियुक्त हुए।
नौरोजी पहले ऐसे भारतीय बने जिन्हें ब्रिटेन में महत्वपूर्ण अकादमिक पद प्रदान किया गया था। उनकी शादी 11 साल की उम्र में ही हो गई थी। वह एक कपास के व्यवसायी और प्रतिष्ठित निर्यातक भी थे। सन 1851 में दादाभाई नौरोजी ने गुजराती भाषा में ‘रस्त गफ्तार’ नामक साप्ताहिक शुरू किया था।
जिसके बाद नौरोजी सन 1885 में बम्बई विधान परिषद के सदस्य बने। सन् 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए। वह लंदन के यूनिवर्सिटी में गुजराती के प्रोफेसर भी थे। फिर सन् 1869 में भारत वापस आए। दादाभाई नौरोजी को लोग सम्मान पूर्वक ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता था। वह भारत के पहले ऐसे नागरिक थे, जिन्होंने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन में सांसद चुना गया था।
ये एशिया के पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने चुनाव को जीता और ब्रिटिश संसद में पहुंचे। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने वहां अंग्रेजी सत्ता के द्वारा भारत में किए जा रहे जुल्म और अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के साथ-साथ उन्होंने ब्रिटिश संसद में महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी मुखरता से विचार रखे। इन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन (1905-1918) की नींव भी रखी थी।
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दादाभाई ने भारत में कुछ ऐसे बदलाव भी किए जिसकी वजह से उन्हें रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध भी सहना पड़ा था। उन्होंने 1840 के दशक में लड़कियों के लिए स्कूल खोला, जिसके बाद केवल 5 साल के अंदर ही बॉम्बे में लड़कियों का स्कूल छात्राओं से भरा हुआ दिखाई देने लगा। उनका कहना था कि भारतीय एक दिन ये बात जरूर समझेंगे कि महिलाओं को दुनिया में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का उतना ही हक है जितना की देश के हर एक पुरुष को है, और आज उनकी यह बात सही मानी जाती है।