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एक कहानी आजादी की: जज पर हमले के लिए मिली सजा-ए-मौत, 18 की उम्र में फांसी पर झूल गया ‘क्रांतिदूत’
Khudiram Bose: 'एक कहानी आजादी की' दूसरी किश्त में आज दास्तान स्वातंत्र्य समर के उस रणबांकुरे की जिसने बचपन से ही अंग्रेजों की खिलाफत की और 18 साल की उम्र में हंसते-हंसते फांसी पर झूल गया।
- Written By: अभिषेक सिंह

खुदीराम बोस (सोर्स- सोशल मीडिया)
Ek Kahani Azadi Ki: 18वां साल…वो उम्र जब हम बचपने और जवानी के बीच झूल रहे होते हैं। वो उम्र जब हम जीवन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में कदम रखते हैं। वो उम्र जब जब हमारे भीतर इश्क पनपता है और हम महबूब की गलियों में पाए जाते हैं। लेकिन इसी 18 साल की उम्र में एक शख्स ऐसा भी था जिसने वतन को माशूक बना लिया। मां भारती को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया।
देश इस महीने की 15 तारीख को अपना 78वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। ऐसे में आज से हम आपके लिए एक सीरीज शुरू करने जा रहे हैं। इसके जरिए हम आपको स्वतंत्रता संग्राम के उन नायकों के बारे में बताएंगे जिनका योगदान हर किसी जितना ही महत्वपूर्ण था। जिसकी दूसरी किश्त में हम खुदीराम बोस की कहानी बताएंगे। एक ऐसे क्रांतिकारी जिन्होंने अपने जुनून से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी।
क्यों ‘खुदीराम’ बोस ही पड़ा नाम?
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में त्रिलोक्यपुरी बोस और लक्ष्मीप्रिया के घर हुआ था। खुदीराम के जन्म से पहले ही उनके माता-पिता बीमारी के कारण अपने दो बेटों को खो चुके थे। इस बार जब खुदीराम तीसरी संतान थे, तो डर स्वाभाविक था। खुदीराम बोस को बचाने के लिए एक चाल चली गई। यह चाल खुदीराम को बुरी नजर से बचाने के लिए की गई थी। बड़ी बहन ने खुदीराम को ताबीज के रूप में चावल देकर खरीदा। चूंकि वहां चावल को खुदी कहा जाता था इसलिए उनका नाम खुदीराम पड़ गया।
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बचपन से ही की अंग्रेजों की खिलाफत
जिस उम्र में लड़के किताबों और स्कूली जीवन में व्यस्त रहते हैं, उसी उम्र में खुदीराम बोस ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी। उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटने का काम सौंपा गया। यह 1906 की बात है। एक और क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ बोस ने वंदे मातरम लिखा और उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ पर्चे बांटने की ज़िम्मेदारी दी गई। इन पर्चों को मिदनापुर में आयोजित एक मेले में बांटने की योजना थी। अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई। अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने इसकी सूचना दे दी।
क्रांतिदूत खुदीराम बोस (सोर्स- सोशल मीडिया)
खुदीराम बोस को देखते ही उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की गई। लेकिन, खुदीराम ने अंग्रेज अफसर के मुंह पर मुक्का मार दिया। हालांकि, कई अंग्रेज सैनिकों की मौजूदगी के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह पहली बार था जब खुदीराम अंग्रेजों के हत्थे चढ़े थे। उन दिनों जिला जज डगलस किंग्सफोर्ड हुआ करते थे। यह जज भारतीयों से बहुत नफरत करता था। भारतीयों पर को सजा की एवज में कोड़े बरसाए जाते थे। 15 साल के खुदीराम को जज ने 15 कोड़े मारने की सजा दी गई।
जज किंग्सफोर्ड को मारने का प्लान
भारतीयों पर जुल्म ढाने वाले डगलस किंग्सफोर्ड को मारने का प्लान बन गया। इसकी ज़िम्मेदारी खुदीराम बोस और उनके साथियों को दी गई। 8 अप्रैल 1908 की तारीख चुनी गई। 17 साल के खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने पहले एक पार्सल में बम छिपाकर डगलस को मारने की योजना बनाई थी। लेकिन, किसी कारणवश किंग्सफोर्ड ने पार्सल नहीं खोला और योजना नाकाम हो गई। जज किंग्सफोर्ड की जगह एक कर्मचारी घायल हो गया। इसके बाद किंग्सफोर्ड ने अपना तबादला बंगाल की बजाय बिहार के मुजफ्फरपुर में करवा लिया। ‘युगांतकारी संगठन’ ने दोनों को पिस्तौल और कारतूस देकर बिहार भेजा गया।
लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा ने अपनी किताब ‘खुदीराम बोस’ में लिखा है कि 18 अप्रैल 1908 को खुदीराम और प्रफुल्ल मिशन के तहत बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे। यहां पंहुचकर दोनों ही क्रांतिदूतों ने किंग्सफोर्ड की दिनचर्या और निवास पर नज़र रखनी शुरू कर दी। दोनों सिपाही एक धर्मशाला में रुके। इसी बीच, खुफिया सूत्रों से पता चला कि किंग्सफोर्ड पर हमला हो सकता है, इसलिए उसकी सुरक्षा बढ़ा दी गई।
किंग्सफोर्ड की बग्घी पर फेंका बम
डगलस किंग्सफोर्ड पर नज़र रखने के बाद, खुदीराम और प्रफुल्ल को पता चला कि वह अपनी पत्नी के साथ स्टेशन क्लब आता-जाता था। यहीं से योजना पर अमल शुरू हुआ। योजना बनी कि जैसे ही किंग्सफोर्ड अपनी पत्नी के साथ बग्घी में वापस आएगा, उसे बम फेंक कर मार दिया जाएगा। 30 अप्रैल 1908 की रात के साढ़े आठ बज रहे थे। जज डगलस किंग्सफोर्ड अपनी बग्घी में रवाना हुए। जैसे ही बग्घी किंग्सफोर्ड के घर के परिसर के पूर्वी द्वार पर पहुंचते ही दोनों बग्घी की तरफ दौड़ पड़े।
क्रांतिकारी खुदीराम बोस (सोर्स- सोशल मीडिया)
बग्घी के 50 मीटर के करीब पहुंचकर दोनों क्रांतिकारियों ने बम अंदर फेंक दिया। दोनों बम फेंककर रफूचक्कर हो गए। लेकिन इस विस्फोट में किंग्सफोर्ड की जान नहीं गई है। क्योंकि जिस गाड़ी पर बम फेंका गया था, वह उसकी नहीं थी। वह उसके साथ यात्रा कर रही दो महिलाओं की थी। उस हमले में एक महिला मारी गई।
घोषित किया गया 5000 का इनाम
हमले के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल 24 किलोमीटर तक भागते रहे। जब दोनों मुजफ्फरपुर के एक छोर पर पहुंच गए तो अपने रास्ते अलग कर लिए। इस विश्वास के साथ कि अगर वे बच गए, तो कलकत्ता में फिर मिलेंगे। किंग्सफोर्ड की हत्या के षडयंत्र की खबर मुजफ्फरपुर में जंगल की आग की तरह फैल गई। दोनों को खोजने के लिए पुलिस बल लगा दिया गया। वहीं, हमलावरों की जानकारी देने पर 5000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था।
कैसे अंग्रेजों के हाथ लग गए खुदीराम?
1 मई 1908 को वणी रेलवे स्टेशन के पास खुदीराम बोस आराम करने के लिए बैठ। वहां कुछ लोग जज डगलस किंग्सफोर्ड की हत्या को लेकर चर्चा कर रहे थे। जिसमें से एक ने बताया कि किंग्सफोर्ड की जगह एक अंग्रेज मां और बेटी बम से मारी गई थीं। यह सुनते ही वह अचानक बोल पड़े- क्या वह नहीं मरा?
जेब से मिली रिवॉल्वर और 37 कारतूस
वहां अंग्रेज सैनिक भी घूम रहे थे। उन्होंने खुदीराम के पैरों में जूते देखकर तुरंत उन्हें पहचान लिया और खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी जेब से 37 कारतूस और 30 रुपये भी मिले। इसके साथ ही एक रिवॉल्वर भी बरामद हुई। पहचान के लिए खुदीराम का वह कोट भी था जो उन्होंने जज की हत्या के प्रयास के समय पहना हुआ था। भागते समय उनका एक जूता भी खो गया था, जो बाद में पता चला कि वह खुदीराम का जूता था।
पुलिस हिरासत में खुदीराम बोस (सोर्स- सोशल मीडिया)
खुदीराम बोस को हमले का दोषी ठहराया गया और उन्हें मुजफ्फरपुर के ज़िला मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया। वहां उनके सामने उनके साथी प्रफुल्ल चाकी का शव पहले से रखा हुआ था। जिन्होंने खुद को अंग्रेजों के चंगुल से बचाने के लिए गोली मार कर आजाद कर लिया था। खुदीराम बोस ने अपने साथी के शव की पहचान की और जिसके बाद तय हुआ कि इन्हीं दोनों ने जज डगलस किंग्सफोर्ड पर हमला किया था।
18 साल की उम्र में दे दी गई फांसी
इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एच. डब्ल्यू. कॉर्नडफ की अदालत में खुदीराम बोस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दायर किया गया। लोग खुदीराम के समर्थन में वंदे मातरम और ज़िंदाबाद के नारे लगाते नज़र आए। एक महीने तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने खुदीराम बोस को फांसी की सज़ा सुनाई। 11 अगस्त 1908 को 18 साल के इस युवा ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया।
भगत सिंह से पहले, खुदीराम बोस ही ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें इतनी कम उम्र में फांसी दी गई थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने खुदीराम की प्रशंसा में और उनकी शहादत पर कई लेख लिखे। आज भी खुदीराम का नाम भारतीय स्वातंत्र्य समर के संघर्षकारी इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर रजत रौशनाई से अंकित है।
18 year young revolutionary khudiram bose hanged for attack on british judge
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