Pregnancy Health Tips: गर्भावस्था में हाई बीपी को न करें नजरअंदाज, मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है बुरा असर
High BP In Pregnancy: गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर बढ़ना मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक है। इस लेख में हम जानेंगे कि इस समस्या को मैनेज कैसे किया जा सकता और किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
- Written By: रीता राय सागर
गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर (फोटो.सोशल मीडिया)
High Blood Pressure During Pregnancy: गर्भावस्था के दौरान शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को ही खास देखभाल की जरूरत होती है। गर्भावस्था के दौरान कई बार ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर (बीपी) बढ़ना मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए इसे इग्नोर नहीं करना चाहिए।
गर्भावस्था के दौरान बीपी बढ़ने से क्या हो सकता है?
- प्लेसेंटा तक खून का प्रवाह कम हो जाता है।
- बच्चे को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता है।
- बच्चे की ग्रोथ प्रभावित होती है।
- समय से पहले डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है।
- प्री-एक्लेम्पसिया यानी दौरा पड़ना नामक गंभीर स्थिति विकसित होने का खतरा।
क्या होता है प्री-एक्लेम्पसिया और एक्लेम्पसिया
प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था के 20 सप्ताह बाद होने वाली एक गंभीर समस्या है, जिसमें बीपी बढ़ जाता है और किडनी, लिवर जैसे अंग प्रभावित होते हैं। समय पर इलाज न मिलने पर मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है। वहीं प्री-एक्लेम्पसिया की अगली स्टेज को एक्लेम्पसिया कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो अगर प्री-एक्लेम्पसिया से ग्रसित किसी महिला को दौरे पड़ने लगते हैं, तो इस स्थिति को फिर एक्लेम्पसिया कहा जाता है।
प्रेग्नेंसी में बीपी बढ़ने के लक्षण
- लगातार सिर में तेज दर्द होना।
- धुंधला दिखना या आंखों के सामने चमक दिखना।
- चेहरे, हाथों या पैरों में अचानक सूजन।
- पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द।
- सांस लेने में परेशानी।
- बच्चे की हरकतें कम महसूस होना।
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गर्भावस्था के दौरान हाई बीपी को कैसे करें कंट्रोल
- नियमित रूप से बीपी की जांच कराते रहें।
- सभी प्रेगनेंसी चेक-अप समय पर कराते रहें।
- डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं नियमित लेते रहें।
- अपने शरीर को रोजाना पर्याप्त आराम दें
- संतुलित आहार और पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करें।
गर्भावस्था में अपने स्वास्थ्य को सही रखने के लिए नियमित रूप से जांच कराना बेहद जरूरी है। इसलिए याद रहे कि समय पर जांच और सही इलाज से बढ़े हुए बीपी और प्री-एक्लेम्पसिया के जोखिम को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
