टाइफाइड (सौ. फ्रीपिक)
Typhoid Myths: टाइफाइड के मामले बदलते मौसम के साथ तेजी से बढ़ने लगते हैं। साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया से होने वाली यह बीमारी अगर सही समय पर न पहचानी जाए तो आंतों में अल्सर और ब्लीडिंग जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है। हालांकि मेडिकल साइंस की प्रगति के बावजूद आज भी लोग टाइफाइड को लेकर कई पुरानी धारणाओं और भ्रमों के जाल में फंसे हुए हैं।
यह सच है कि दूषित पानी टाइफाइड का मुख्य स्रोत है लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है। दूषित भोजन, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने या खुले में बिकने वाले फलों और सब्जियों के सेवन से भी यह तेजी से फैलता है।
यह सबसे खतरनाक भ्रम है। अक्सर मरीज दो-तीन दिन एंटीबायोटिक लेने के बाद बुखार उतरते ही कोर्स अधूरा छोड़ देते हैं। इससे बैक्टीरिया शरीर में पूरी तरह खत्म नहीं होते और बीमारी दोबारा (Relapse) लौट आती है, जो पहले से ज्यादा घातक हो सकती है।
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पुराने समय में लोग केवल मूंग की दाल का पानी पीने की सलाह देते थे। हालांकि डॉक्टर अब इसे गलत मानते हैं। रिकवरी के लिए शरीर को ऊर्जा चाहिए। उबला हुआ दूध, केला और अच्छी तरह पका हुआ दलिया जैसे नरम खाद्य पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है, बस मिर्च-मसाले और कच्ची चीजों से परहेज जरूरी है।
चिकन पॉक्स जैसी बीमारियों के विपरीत टाइफाइड से शरीर में स्थायी इम्यूनिटी नहीं बनती। अगर आप दोबारा दूषित खान-पान के संपर्क में आते हैं तो यह संक्रमण आपको फिर से अपनी चपेट में ले सकता है।
वैक्सीन लगवाने के बाद संक्रमित होने का खतरा जीरो हो जाता है। टाइफाइड की वैक्सीन सुरक्षा प्रदान करती है लेकिन यह 100% गारंटी नहीं है। वैक्सीन के बावजूद आपको साफ-सफाई और खान-पान का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि वैक्सीन केवल संक्रमण की गंभीरता को कम करती है।
टाइफाइड के लक्षण दिखने पर खुद इलाज करने या भ्रम पालने की जगह डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। बिना मेडिकल सलाह के एंटीबायोटिक लेना एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पैदा कर सकता है। लक्षणों को पहचानें और समय पर विडाल टेस्ट कराकर पूरा इलाज लें।