मोबाइल और टीवी की लत चुरा रही है आपके बच्चे का बचपन? ये आदत बन सकती है बड़ी परेशानी
Child Screen Addiction Effects: आज के डिजिटल दौर में बच्चों का ज्यादा समय मोबाइल और टीवी स्क्रीन के सामने बीत रहा है जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर डाल सकता है।
- Written By: प्रीति शर्मा
टीवी स्क्रीन के सामने बैठा बच्चा (सौ. फ्रीपिक)
Child Screen Addiction: क्या आपने कभी गौर किया है कि आपके घर का नन्हा सदस्य अब मैदान में भागने के बजाय सोफे के कोने में बैठकर घंटों मोबाइल स्क्रीन को निहारता रहता है। आधुनिक युग में स्मार्टफोन और टीवी बच्चों की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। लेकिन जिसे पेरेंट्स अपनी सहूलियत का जरिया समझते हैं वह असल में बच्चों के भविष्य के लिए एक साइलेंट किलर साबित हो रहा है। बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर रहा है।
भविष्य के साथ खिलवाड़
आजकल की व्यस्त जीवनशैली में कई माता-पिता बच्चों को शांत रखने या खाना खिलाने के बहाने उनके हाथ में स्मार्टफोन थमा देते हैं। शुरू में यह एक आसान समाधान लगता है लेकिन धीरे-धीरे यह डिजिटल नशा बन जाता है। जब बच्चा स्क्रीन से चिपक जाता है तो उसका वास्तविक दुनिया से संपर्क टूट जाता है जो उसके सामाजिक कौशल के विकास में सबसे बड़ी बाधा है।
सेहत पर पड़ रहा है बुरा असर
पहले जहां बच्चों की शाम गलियों में दौड़ते-भागते बीतती थी वहीं अब उनका समय वीडियो गेम्स और कार्टून ने ले लिया है। इस शारीरिक निष्क्रियता के कारण बच्चों में चाइल्डहुड ओबेसिटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। घंटों एक ही स्थिति में बैठने से रीढ़ की हड्डी में दिक्कत, आंखों में सूखापन और कम उम्र में चश्मा लगने जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। इतना ही नहीं मोबाइल से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों की नींद के चक्र को बिगाड़ देती है जिससे वे दिनभर चिड़चिड़े और थके हुए रहते हैं।
सम्बंधित ख़बरें
नवभारत विशेष: बीमारी और काम के बोझ से दबे पुलिसकर्मी, कैसे कर पाएंगे अपराध नियंत्रण ?
एल्युमिनियम या स्टील: कहीं आप भी गलत बर्तन में तो नहीं उबाल रहे दूध? सेहत पर पड़ता है ये गंभीर असर!
Mango Side Effects: आम खाने से पहले यहां जान लीजिए, आपको खाना चाहिए या नहीं, किसे है ख़तरा?
Sahjan Leaves Health: सहजन के पत्ते का पानी के हैं गजब फायदे! जानकर हो जाएंगे हैरान! आज़मा कर भी देख लीजिए
दिमागी विकास और व्यवहार में बदलाव
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की अटेंशन स्पैन को कम कर रहा है। इंटरनेट पर मिलने वाली तेज-तर्रार सूचनाओं के कारण बच्चों में धैर्य की कमी हो रही है और वे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं। जब बच्चा असल दुनिया के बजाय वर्चुअल दुनिया में रहने लगता है तो उसमें सहानुभूति, मेलजोल और संवाद करने की क्षमता घटने लगती है।
यह भी पढ़ें:- एल्युमिनियम या स्टील: कहीं आप भी गलत बर्तन में तो नहीं उबाल रहे दूध? सेहत पर पड़ता है ये गंभीर असर!
जरूरत और लत के बीच का अंतर
यह सच है कि डिजिटल युग में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर नहीं रखा जा सकता। ऑनलाइन शिक्षा, कोडिंग और ज्ञानवर्धक वीडियो उनके लिए जरूरी भी हैं। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब शिक्षा और मनोरंजन का संतुलन बिगड़ जाता है। तकनीक का इस्तेमाल उपकरण की तरह होना चाहिए न कि आदत की तरह।
बचाव के उपाय
बच्चों को इस दलदल से निकालने के लिए पेरेंट्स को डिजिटल डिटॉक्स की नीति अपनानी होगी। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम का एक निश्चित समय तय करें और उनके साथ खुद भी समय बिताएं। उन्हें आउटडोर खेलों, पेंटिंग या संगीत जैसी रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। बच्चा वही सीखता है जो वह अपने बड़ों को करते हुए देखता है इसलिए बच्चों के सामने खुद भी मोबाइल का सीमित उपयोग करें।
