उत्पल दत्त (फोटो- सोशल मीडिया)
Utpal Dutt Birth Anniversary Special Story: बड़ी-बड़ी आंखें, घनी मूंछें और गहरी आवाज ये पहचान थी दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त की। स्क्रीन पर उनका व्यक्तित्व अक्सर खलनायक जैसा दिखता था, लेकिन जैसे ही वे संवाद बोलते, दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती। गंभीरता और हास्य का अनोखा मेल उनकी अभिनय शैली की सबसे बड़ी खासियत थी।
29 मार्च को उनकी जयंती के मौके पर उन्हें याद करते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्पल दत्त अभिनय के सच्चे साधक थे। हिंदी और बांग्ला सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इस कलाकार का असली जुनून रंगमंच था। उत्पल दत्त अक्सर कहा करते थे कि फिल्मों में काम सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि थिएटर का खर्च निकाल सकें।
1940 के दशक में वे ब्रिटिश निर्देशक जेफ्री कैंडल के थिएटर ग्रुप से जुड़े और शेक्सपियर के नाटकों में अभिनय किया। इसके बाद उन्होंने अपना नाट्य समूह बनाया और इप्टा के साथ मिलकर कई सामाजिक और राजनीतिक नाटक किए, जो आज भी याद किए जाते हैं। उत्पल दत्त ने 1950 में बांग्ला फिल्म ‘माइकल मधुसूदन दत्त’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की।
लंबे समय तक बांग्ला सिनेमा में सक्रिय रहने के बाद उत्पल दत्त ने हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया। भुवन शोम से हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाले उत्पल दत्त ने चरित्र भूमिकाओं में भी अपनी अलग पहचान बनाई। ‘शौकीन’, ‘गुड्डी’, ‘अमानुष’ और सात हिंदुस्तानी जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी दर्शकों के जेहन में बसे हुए हैं। उन्होंने साबित किया कि छोटी या सहायक भूमिका भी यादगार बन सकती है।
बांग्ला पृष्ठभूमि से आने के कारण शुरू में उन्हें हिंदी उच्चारण में कठिनाई होती थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। किताबें पढ़कर और लोगों से संवाद कर उन्होंने अपनी हिंदी पर शानदार पकड़ बना ली। उत्पल दत्त का मानना था कि हास्य सहज होना चाहिए, बनावटी नहीं। वे आम जीवन की परिस्थितियों से हास्य निकालने में विश्वास रखते थे। 19 अगस्त 1993 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन अपनी अदाकारी से वे आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं।