मूवी रिव्यू: रहस्यमयी और खौफनाक है सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म निकिता रॉय
निकिता राय फिल्म रहस्य और परंपराओं से जुड़ी हुई एक खौफनाक फिल्म है। सोनाक्षी सिन्हा ने एक बार फिर खुद को साबित किया है, जबकि कुश सिन्हा की पहली फिल्म उनके निर्देशन क्षमता को भी साबित कर रही है।
- Written By: अनिल सिंह
रहस्य और परंपराओं से जुड़ी सच्चाइयों को उजागर करती है सोनाक्षी सिंह की फिल्म निकिता रॉय
Nikita Roy Review: बॉलीवुड में सुपरनैचुरल थ्रिलर कम ही बनती हैं, लेकिन जब सही तरीके से बनाई जाती हैं, तो ये फिल्में केवल डर नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाली बन जाती हैं। ‘निकिता रॉय’, निर्देशक कुश सिन्हा की पहली फिल्म है, जो इसी तरह की एक गूढ़ और प्रभावशाली कहानी है। यह फिल्म केवल एक भूतिया कहानी नहीं है, बल्कि यह परंपराओं के पीछे छिपी सच्चाइयों और विश्वास की दोधारी तलवार पर एक तीखी टिप्पणी है।
- निर्देशक- कुश सिन्हा
- कलाकार- सोनाक्षी सिन्हा, परेश रावल, अर्जुन रामपाल और सुहैल नैय्यर
- रनटाइम- 1 घंटा 56 मिनट
- रेटिंग- 3.5 स्टार्स
कहानी: फिल्म की कहानी निकिता रॉय (सोनाक्षी सिन्हा) पर केंद्रित है, जो एक तेज-तर्रार और तर्कवादी लेखिका हैं। वह एक ऐसी टीम की अगुवाई करती है जो आध्यात्मिक धोखाधड़ी का पर्दाफाश करती है। लंदन में अपने भाई की रहस्यमयी मौत के बाद, निकिता खुद को एक जटिल रहस्य के बीच पाती है। यह सिर्फ न्याय की तलाश नहीं है, बल्कि एक गहरा व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक सफर है, जो डर, शोक और सांस्कृतिक विश्वासों के बीच झूलता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, रहस्य और अलौकिकता बढ़ती जाती है, लेकिन साथ ही भावनात्मक घावों और मनुष्यों की ‘अज्ञात में अर्थ’ खोजने की प्रवृत्ति पर भी रोशनी डाल जाती है। फिल्म की शुरुआत से ही माहौल बन जाता है। अर्जुन रामपाल के साथ एक शुरुआती दृश्य आने वाले अंधकार की झलक देता है।
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अभिनय: सोनाक्षी सिन्हा का अभिनय संयमित लेकिन भावनात्मक रूप से गहरा है, वह कमजोरियों के साथ ताकत भी दिखाती हैं। सुहैल नैय्यर अपने संतुलित अभिनय से कहानी में गहराई जोड़ते हैं, बिना मुख्य ध्यान भटकाए। परेश रावल, अमरदेव की भूमिका में, एक आध्यात्मिक गुरु का किरदार निभाते हैं जो बाहर से पूजनीय लेकिन भीतर से रहस्यमय और खौफनाक है। उनके अभिनय में डर चीखता नहीं, बल्कि नजरों और खामोशी में छिपा होता है।
फाइनल टेक: दृश्यात्मक रूप से फिल्म बेहद प्रभावशाली है। इसमें सस्ते डरावने दृश्य या ज़ोरदार संगीत का सहारा नहीं लिया गया, बल्कि मंद रोशनी, तंग जगहों की बनावट और धीमे-धीमे बढ़ते तनाव से डर को जन्म दिया गया है। स्क्रीनप्ले, जो पवन कृपलानी ने लिखा है, वह क्लिच से दूर रहता है। दर्शक को कहानी के साथ सोचने और समझने का मौका दिया गया है। फिल्म की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और जब अंत आता है, तो वह किसी दिखावटी ट्विस्ट की जगह एक सच्चाई की तरह सामने आता है—धीमा लेकिन असरदार। निर्माण की गुणवत्ता भी फिल्म की ताकत है। निक्की-विक्की भगनानी फिल्म्स, निकिता पाई फिल्म्स लिमिटेड और बावेजा स्टूडियोज जैसे प्रोडक्शन हाउस ने मिलकर इस डेब्यू फिल्म को एक साफ-सुथरी, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण प्रस्तुति दी है। आखिर में, ‘निकिता रॉय’ सिर्फ डराने वाली फिल्म नहीं है, यह एक विचारोत्तेजक अनुभव है। यह सवाल पूछती है कि सच्चाई क्या है, विश्वास कितना सही है और कौन-सी बातें हमें पीढ़ियों से डराती आ रही हैं। सोनाक्षी सिन्हा और परेश रावल के प्रभावशाली अभिनय के साथ, यह फिल्म दर्शकों को सोचने और महसूस करने के लिए मजबूर करती है।
