Haq Movie Review: यामी गौतम हैं फिल्म की जान, पर्दे पर इमोशन जगाने में कमजोर पड़ी फिल्म
Haq Film Review: यामी गौतम की सशक्त एक्टिंग के बावजूद, सुपर्ण वर्मा की यह फिल्म 1985 के शाह बानो केस की भावनात्मक गहराई को छूने में कमज़ोर पड़ी।
- Written By: अनिल सिंह
'हक' रिव्यू: एक महिला का न्याय-संघर्ष; Yami Gautam बनीं फिल्म की मज़बूत नींव
- निर्देशक: सुपर्ण वर्मा
- रनटाइम: 2 घंटे 14 मिनट
- रेटिंग्स: 2.5 स्टार्स
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Movie Review: यामी गौतम और इमरान हाशमी स्टारर फिल्म ‘हक’ (Haq), 1985 के ऐतिहासिक शाह बानो केस से प्रेरित होकर परदे पर आई है। निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने इस संवेदनशील और चर्चित कानूनी विवाद को एक महिला के निजी संघर्ष के रूप में पेश किया है। फिल्म में यामी गौतम ने शाजिया बानो और इमरान हाशमी ने उनके पति अब्बास खान का किरदार निभाया है। यह कहानी एक खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी से शुरू होती है, जहाँ शाजिया और अब्बास बेपनाह प्यार से रहते हैं। मगर, अब्बास द्वारा दूसरी शादी करने और फिर शरिया कानून का हवाला देकर शाजिया को दबाने की कोशिशों के साथ ही उनकी ज़िन्दगी में एक नकारात्मक मोड़ आ जाता है।
पति के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और अंततः तलाक के बाद, शाजिया न केवल अपने बच्चों के पालन-पोषण बल्कि अपने हक के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाती है। यह विवाद जल्द ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हस्तक्षेप के चलते एक व्यक्तिगत मामले से धार्मिक मुद्दा बन जाता है। फिल्म का क्लाइमेक्स सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के साथ होता है, जिसमें शाजिया के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कोर्ट यह स्थापित करती है कि व्यक्ति किसी भी धर्म का हो, सभी को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के नियमों के अनुसार न्याय का अधिकार है।
यामी गौतम: फिल्म की ‘जान’ और शाजिया बानो का सशक्त चित्रण
फिल्म के प्रदर्शन की बात करें तो, यह पूरी तरह से यामी गौतम की है। एक हिंदू ब्राह्मण परिवार से आने वाली यामी ने जिस बारीकी और संवेदनशीलता के साथ मुस्लिम महिला शाजिया बानो के किरदार को जिया है, वह असाधारण है। उनके एक्सप्रेशन्स और बॉडी लैंग्वेज ने कई सीन्स में बिना डायलॉग के भी जान डाल दी है। शाजिया के रूप में उनकी दमदार तरीके से अपनी बात रखने की कला एक कलाकार के रूप में उनके गहरे टैलेंट को दर्शाती है। वहीं, इमरान हाशमी ने अब्बास खान के किरदार को भी बखूबी निभाया है। उनका लुक उनकी पुरानी फिल्म ‘वन्स अपोन ए टाइम इन मुंबई’ की याद दिलाता है। सहायक कलाकारों में शीबा चड्ढा ने अधिवक्ता के रूप में सराहनीय काम किया है।
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म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर: भावनाओं का साथ
फिल्म का म्यूजिक निस्संदेह खूबसूरत है। विशाल मिश्रा द्वारा गाए गए गाने ‘दिल तोड़ गया तू’ और ‘क़ुबूल’ भावनाओं से भरे हुए हैं, जो कहानी के साथ तालमेल बिठाते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी कहानी को एक आवश्यक भावनात्मक वजन देने में सफल रहा है, हालांकि यह कहीं भी कहानी पर हावी नहीं होता। म्यूजिक टीम को कहानी के संवेदनशील विषय के साथ न्याय करने के लिए बधाई दी जा सकती है।
सिनेमाई अनुभव में कमज़ोर कड़ी
निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने ‘हक’ को एक कसा हुआ कोर्टरूम ड्रामा बनाने की कोशिश की है जो सीधे मुद्दे पर बात करता है। हालांकि, समीक्षा के अनुसार, एक संपूर्ण एंटरटेनिंग सिनेमाई अनुभव देने के लिए यामी गौतम का शानदार प्रदर्शन ही काफी नहीं है। फिल्म कुछ सीन्स को छोड़कर दर्शकों की भावनाओं को छूने में कमजोर साबित होती है। फिल्म का पहला हाफ धीमा महसूस होता है, और जिस फाइनल कोर्टरूम सीन से सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं, वह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। क्लाइमेक्स में, अब्बास और शाजिया द्वारा चंद मिनटों के लिए अपनी बात रखने और फिर न्यायालय के तुरंत फैसला सुनाने से, वास्तविक जीवन के मामले की जटिलता कहीं-कहीं सरलीकृत महसूस होती है। मेकर्स ने फिल्म को सीमित समय में बांधने के प्रयास में मानवीय भावनाओं और कोर्टरूम ड्रामा को और बेहतर तरीके से लिखने का मौका खो दिया है।
फाइनल टेक
‘हक’ एक ज़रूरी विषय पर बनी एक गंभीर फिल्म है, जो कानूनी विवाद से अधिक एक महिला के सम्मान और न्याय के संघर्ष को दर्शाती है। मगर, सिनेमाघरों में इसे देखने लायक ‘ग्रैंड’ अनुभव नहीं मिलता। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे इत्मीनान से ओटीटी पर देखा जा सकता है, खासकर यदि आप शाह बानो केस के बारे में और जानना चाहते हैं। यह फिल्म कोर्टरूम ड्रामा के साथ-साथ सामाजिक टिप्पणी का एक मिला-जुला रूप है, जिसमें यामी गौतम का अभिनय सबसे बड़ी ताकत है।
