120 Bahadur Review: इमोशन जगाने में कमजोर पड़ी फिल्म, फरहान अख्तर के कमबैक में नहीं है दम
Movie Review: फरहान अख्तर स्टारर '120 बहादुर' रिजांग ला की लड़ाई पर आधारित है। फिल्म का पहला भाग भावनात्मक रूप से कमजोर है, जबकि युद्ध के दृश्य और सिनेमैटोग्राफी दमदार हैं।
- Written By: अनिल सिंह
120 बहादुर' रिव्यू: फरहान अख्तर की कमबैक फिल्म इमोशन जगाने में हुई फेल, युद्ध के दृश्य दमदार
- फिल्म: 120 बहादुर
- कास्ट: फरहान अख्तर, राशि खन्ना, , अंकित सिवछ, विवियन भटेना, अजिंक्य देओ, एजाज खान और आशुतोष शुक्ल
- निर्देशक: रजनीश घई
- रनटाइम: 2 घंटे 17 मिनट्स
- रेटिंग्स: 2.5 स्टार्स
कहानी: 1962 की रिजांग ला की लड़ाई पर आधारित यह फिल्म एक रेडियो ऑपरेटर (स्पर्श वालिया) की यादों के माध्यम से कहानी बताती है। फरहान अख्तर ने शैतान सिंह भाटी का किरदार निभाया है, जिनके नेतृत्व में चार्ली कंपनी, 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के 120 सैनिकों ने चीनी सेनाओं से रिजांग ला पास की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। निर्देशक रजनीश रजी घोष ने फिल्म को असली लोकेशन्स पर शूट किया है, जिससे कहानी को वास्तविकता का एहसास मिलता है। लेह की कठोर सुंदरता को टेट्सुओ नागाटा की सिनेमाटोग्राफी ने बेहतरीन तरीके से कैप्चर किया है।
पहले हिस्से में सैनिकों के परिवार से दूर रहने की मानसिक पीड़ा को दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन शैतान के रिजांग ला से पहले के जीवन वाले हिस्से भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ते हैं। जैसे फरहान और उनके ऑन-स्क्रीन पत्नी राशी खन्ना पर आधारित एक गाना कहानी के प्रवाह में थोड़ा अनावश्यक लगता है। फिल्म का दूसरा भाग जीवंत हो जाता है, जब दोनों सेनाएं आमने-सामने आती हैं। युद्ध दृश्य में खून और हिंसा को रोकने का प्रयास नहीं किया गया और सैनिकों की निस्वार्थता भावनाओं को झकझोर देती है। चीनी सेना द्वारा शैतान को सम्मान देना भी फिल्म को संतुलित करता है।
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अभिनय: फरहान अख्तर ने अपने किरदार में ठोस प्रदर्शन दिया है। हालांकि उनकी स्टाइलिश और सुगम बोलने की आदत कभी-कभी यह याद दिलाती है कि आप फरहान देख रहे हैं, न कि उनका किरदार। लेकिन क्लाइमेक्स में उन्होंने इसे पूरा सुधार लिया। स्पर्श वालिया रेडियो ऑपरेटर के किरदार में फिट बैठते हैं, जबकि राशी खन्ना भी अपने रोल में ठीक हैं। हालांकि उनका गाना फिल्म में ज्यादा योगदान नहीं देता।
फाइनल टेक: 120 बहादुर तकनीकी स्तर पर बेहतर है और निर्देशक की नीयत साफ नजर आती है। लेकिन फिल्म को भावनात्मक गहराई की अधिक जरूरत थी, ताकि यह तकनीकी खूबियों के साथ इसे और बेहतर बना सके। बिना क्लिशेड मेलोड्रामा के बेहतर स्क्रिप्ट और इमोशनल-स्पेकटेकल के बीच संतुलन इसे एक गंभीर श्रद्धांजलि से बढ़ाकर एक प्रभावशाली युद्ध ड्रामा बना सकती थी। कुल मिलाकर, यह फिल्म ईमानदार श्रद्धांजलि है, लेकिन उस महाकाव्य स्तर की पकड़ नहीं बना पाती, जिसकी इस तरह की कहानी हकदार थी।
