डैनी डेंजोंगप्पा (फोटो- सोशल मीडिया)
Danny Denzongpa Birthday Special Story: फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत कब किसे किस राह पर ले जाए, यह कहना मुश्किल है। अभिनेता डैनी डेंजोंगप्पा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जेब में मात्र 1,500 रुपए लेकर मुंबई आए डैनी का सपना गजल सिंगर बनने का था, लेकिन वक्त ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे खतरनाक विलेन बना दिया।
25 फरवरी 1948 को गंगटोक में जन्मे डैनी का असली नाम शेरिंग फिनसो था। बचपन से ही उन्हें संगीत और कला में गहरी रुचि थी। अभिनय की पढ़ाई के लिए उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिला लिया। कोर्स पूरा करने के बाद वे बड़े सपनों के साथ मुंबई पहुंचे। मुंबई में शुरुआती दिन संघर्ष से भरे रहे।
सीमित पैसों में गुजारा करते हुए वे स्टूडियो और डायरेक्टरों के दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे। एक बार वे निर्देशक मोहन कुमार के बंगले पर काम की तलाश में पहुंचे, जहां उन्हें गार्ड की नौकरी का प्रस्ताव दिया गया। यह बात उन्हें चुभ गई। उन्होंने उसी वक्त ठान लिया कि एक दिन वे इतने सफल होंगे कि उसी इलाके में उनका अपना बंगला होगा और बाद में उन्होंने यह सपना सच भी कर दिखाया।
डैनी ने 1971 में आई फिल्म मेरे अपने से अपने करियर की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने सकारात्मक भूमिका निभाई। लेकिन 1973 की फिल्म धुंद में नेगेटिव किरदार निभाने के बाद उनकी पहचान एक दमदार विलेन के रूप में बनी। उनकी गहरी आवाज, तीखी आंखें और प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों के मन में डर और रोमांच दोनों पैदा किए। दिलचस्प बात यह है कि 1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले में गब्बर सिंह का रोल पहले डैनी को ऑफर हुआ था, लेकिन डेट्स की कमी के कारण उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
हिंदी सिनेमा के अलावा डैनी ने नेपाली, तमिल, तेलुगु और हॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया। 2003 में आई हॉलीवुड फिल्म सेवन इयर्स इन तिब्बत में उन्होंने ब्रैड पित्त के साथ स्क्रीन साझा की। उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 2003 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। गजल सिंगर बनने का सपना लेकर आए डैनी डेन्जोंगपा ने अपने अभिनय से यह साबित कर दिया कि मेहनत और जज्बा इंसान को किसी भी मुकाम तक पहुंचा सकता है।