

West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी जिस 'लाल झंडे' की तूती बोलती थी, आज वह अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 साल सत्ता पर कब्जा बनाए रखा, लेकिन आज यह दल चुनावी रूप से अप्रासंगिक होने की कगार पर है।
सत्ता की लंबी आदत, जनता से टूटता संपर्क और रणनीतिक चूकों ने एक समय की अपराजेय ताकत को 'जीरो' पर लाकर खड़ा कर दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं किन कारणों से लेफ्ट के हाथ से पूरा बंगाल रेत की तरह निकलता चला गया।
वामपंथ के पतन की कहानी आंकड़ों में बेहद चौंकाने वाली है। साल 2011 में सत्ता गंवाने के बाद भी CPM के पास 40% वोट बैंक सुरक्षित था। लेकिन इसके बाद ग्राफ तेजी से नीचे गिरा, देखिए ये आंकड़े:
2016 विधानसभा: वोट शेयर गिरकर ~26% हुआ और सीटें 32 रह गईं।
2019 लोकसभा: वोट शेयर महज 6.28% रह गया और पार्टी विपक्ष की जगह भाजपा से हार गई।
2021 विधानसभा: वामपंथियों का सूपड़ा साफ हो गया; वोट शेयर 5% से भी कम रहा और सीटों का खाता शून्य रहा।
वामपंथ के पतन की शुरुआत सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों से हुई। साल 2006 में टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए सिंगूर में भूमि अधिग्रहण विवाद और 2007 में नंदीग्राम में SEZ के खिलाफ हुए हिंसक आंदोलनों ने लेफ्ट की "किसान-हितैषी" छवि को मटियामेट कर दिया। इन घटनाओं ने उस जनमत को वामपंथ के खिलाफ खड़ा कर दिया जो पहले से ही 34 साल के शासन से ऊब चुका था। ममता बनर्जी ने इन आंदोलनों को बखूबी भुनाया और 'परिवर्तन' की लहर पैदा कर दी।
राजनीतिक पंडितों की मानें तो लंबे शासन के दौरान प्रशासन और पार्टी के बीच का अंतर खत्म हो गया था। पार्टी कार्यालय सरकारी कामकाज के बंटवारे के केंद्र बन गए, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच भ्रष्टाचार फैल गया। सफल भूमि सुधारों के बाद सहकारी खेती लागू करने में विफलता ने भी कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया। धीरे-धीरे पार्टी का ग्रासरूट कनेक्ट कमजोर हुआ और वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रही।
वामपंथ के पतन का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 23% तक बढ़ गया, जबकि वामपंथियों को ठीक उतना ही नुकसान हुआ। कई वामपंथी कैडरों ने तृणमूल कांग्रेस से मुकाबला करने के लिए अपनी विचारधारा के विपरीत भाजपा का दामन थाम लिया या उन्हें समर्थन दे दिया। भाजपा ने इस 'राजनीतिक खालीपन' को भरा और 2021 में 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष बन गई, जबकि लेफ्ट हाशिए पर चला गया।
पार्टी के भीतर नेतृत्व का बड़ा संकट उभरकर सामने आया। युवा वोटर्स को लेफ्ट का नैरेटिव पुराना लगने लगा। हाल ही में युवा नेता प्रतीकुर रहमान, जिन्होंने डायमंड हार्बर से अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था, ने CPM छोड़कर TMC का दामन थाम लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व ने उनके काम को नजरअंदाज किया और शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया। वर्तमान में मुकाबला मुख्य रूप से TMC बनाम BJP बन चुका है और लेफ्ट के लिए वापसी की राह नेतृत्व और संसाधनों के अभाव में बेहद कठिन नजर आती है।