उल्हासनगर विधानसभा सीट (डिजाइन फोटो)
मुंबई: महाराष्ट्र के चुनावी समरांगण में सत्ता के लिए चुनावी संघर्ष शुरू होने वाला है। सियासी दलों ने भी इस लड़ाई के लिए कमर कस ली है। एक-एक सीट को लेकर मंथन किया जा रहा है जिससे कहीं भी किसी तरह की चूक न होने पाए। इस मौके पर हम भी सीट वाइज सारे समीकरण आप तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। जिससे हर एक सीट के चुनावी मुद्दे, वहां के जातीय समीकरण, वहां के वोटिंग पैटर्न को देखते हुए आप हार पार्टी या प्रत्याशियों के हार जीत की संभावनाओं का आकलन कर सकें।
सीट दर सीट आप तक पहुंचाई जा रही जानकारी की सीरीज में आज बारी है उल्हासनगर सीट की। इस सीट पर पार्टियों से ज्यादा जनता ने उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है। क्योंकि 1972 से चली आ रही चुनावी जंग में दो नाम ऐसे हैं जिन्होंने तीन औऱ चार बार जीत हासिल की हैं। जिसमें एक ने दो पार्टियों से जीत दर्ज की है तो दूसरे ने दो बार अलग-अलग पार्टी के टिकट पर तो एक बार निर्दलीय भी विजयश्री हासिल की है।
साल 1972 में यहां कांग्रेस के टिकट पर सन्मुख चूहरमल ने जीत दर्ज की। जिसके बाद 1978 में एफबीएल के टिकट पर हरचंदानी शीतलदास ने बाजी मारी। 1980 और 1985 में हरचंदानी शीतलदास ने ही भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता। इसके बाद 1990 में कालानी सुरेश पप्पू ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। लेकिन 1995 में उन्हें कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय मैदान में उतरकर विजय पताका फहरा दी। साल 1999 में उन्होंने एनवीवीपी और 2004 में आरपीआई (ए) के टिकट पर जीत हासिल की।
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दिलचस्प बात यह है कि 2009 में भले ही कुमार उत्तमचंद ने बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल कर ली, लेकिन इसके अगले चुनाव में सुरेश पप्पू कलानी की पत्नी ज्योति कलानी ने यहां एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल कर ली। हालांकि पिछले यानी 2019 के चुनाव में कुमार उत्तमचंद अइल्यानी ने एक बार फिर से इस सीट पर वापस कब्जा कर लिया।
आपको बता दें कि उल्हासनगर विधानसभा क्षेत्र कल्याण संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। यह शहर औद्योगिक नगरी के तौर पर जाना जाता है। इसके अलावा यह महाराष्ट्र की एकमात्र विधानसभा सीट है जहां सबसे ज्यादा सिंधी समुदाय के लोग रहते हैं। कैंप नंबर 1, 2 और 3 और इसके पास के तीन गांव महारल, वरप और कंभा को भी इस सीट में शामिल किया गया है। परिसीमन के बाद भी यह सीट सिंधी समुदाय के उम्मीदवार के लिए मुफीद है। सिंधी मतदाताओं के अलावा यहां उत्तर भारतीय, मराठी, दलित और अल्पसंख्यक मतदाता भी हैं।
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महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले पांच सालों में हुई उठा पटक के बाद कई सीटें ऐसी हैं जहां हार जीत का सही अनुमान लगा पाना झूठ व मनगढंत कहानी के अलावा कुछ नहीं होगा। उल्हासनगर सीट उन्हीं सीटों में से एक है। लेकिन अगर वोटिंग पैटर्न और जनता के मूड की बात करें तो यहां इस बार चुनाव बराबरी का नज़र आने वाला है। अब देखना दिलचस्प होगा की बराबरी की इस जंग में बाजी कौन मारेगा?