डोंबिवली विधानसभा सीट: हर बार लगातार जीत रहा बीजेपी उम्मीदवार, क्या अबकी बार विपक्ष कर पाएगा शिकार?
महाराष्ट्र में चुनावी जंग की रणभेरी बजने ही वाली है। उससे पहले सियासी दल और सियासतदान रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। ऐसे में आज हम बात कर रहे हैं थाणे जिले और कल्याण लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली डोंबिवली विधानसभा सीट के बारे में...
- Written By: मृणाल पाठक
डोंबिवली विधानसभा सीट (डिजाइन फोटो)
मुंबई: महाराष्ट्र में चुनावी जंग की रणभेरी बजने ही वाली है। उससे पहले सियासी दल और सियासतदान रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषक भी मौसम का मिजाज भांपने में लगे हुए हैं। इसी कड़ी में हम भी चाहते हैं कि आप तक हर सीट का विश्लेषण भी पहुंचाया जाए। जिससे चाय की चौपाल पर चर्चा के दौरान आपको हर सीट के आंकड़े और कहां किसका दबदबा रहा है या फिर रहने वाला यह पता रहे। तो बात करते हैं आज डोंबिवली विधानसभा सीट की।
2009 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट का इतिहास बहुत ज्यादा लंबा नहीं है। इसके साथ ही यहां की जंग भी ज्यादा दिलचस्प नहीं रही है। क्योंकि 2009 से लेकर 2019 तक एक ही पार्टी और एक ही उम्मीदवार जीत दर्ज करते हुए चला आ रहा है। यहां पहले विधानसभा चुनाव से ही एक छत्र बीजेपी राज कर रही है। रवीन्द्र दत्तात्रेय चव्हाण को जनता लगातार जनादेश देती चली आ रही है।
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अब तक हर बार जीता बीजेपी उम्मीदवार
- 2019 चव्हाण रवीन्द्र दत्तात्रेय भाजपा 86227
- 2014 चव्हाण रवीन्द्र दत्तात्रय भाजपा 83872
- 2009 चव्हाण रवीन्द्र दत्तात्रय भाजपा 61104
कैसे हैं जातीय समीकरण?
थाणे जिले और कल्याण लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली डोंबिवली विधानसभा सीट पर सवर्ण वोटर जीत हार में अहम भूमिका निभाते हैं। बीजेपी की लगातार जीत की वजह भी यही है क्योंकि सवर्ण बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है। इसके साथ ही इस सीट पर 19 हजार के करीब दलित, हजार के आस पास आदिवासी और 5 हजार के आस-पास मुस्लिम वोटर्स हैं। यहां सभी 3 लाख 60 हजार वोटर्स अर्बन एरिया में आते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर शहर से जुड़ी समस्याएं ही चुनावी मुद्दा बनती हैं।
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अबकी बार किसकी सरकार?
डोंबिवली में इस बार कौन जीतेगा इसका अंदाजा लगान बिल्कुल मुश्किल नहीं है। यहां उम्मीद है कि एक बार फिर से भाजपा रवीन्द्र दत्तात्रेय चव्हाण पर ही भरोसा जताएगी। ऐसा होता है तो विजयश्री बीजेपी के हिस्से में जाना लगभग तय है। हालांकि यह संभावनाएं आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित हैं। जबकि राजनीति में क्रिकेट के खेल की तरह अनिश्चितताएं देखने को मिलती हैं। यहां कब क्या हो जाए, कौन जीतते जीतते हार जाए या कौन हारते हुए भी जीतकर बाजीगर बन जाए कहा नहीं जा सकता!
