
सोर्स- सोशल मीडिया
Bihar Election 2025 New Cabinet: बिहार में NDA की बड़ी जीत के बाद अब सभी की नजरें नए मंत्रिमंडल पर टिक गई हैं। 20 नवंबर को नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, ऐसे में कैबिनेट विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। किस जाति, किस क्षेत्र और किस पार्टी को कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा, यही इस विस्तार की सबसे बड़ी चुनौती होगी। साथ ही सहयोगी दलों की अपेक्षाओं और भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों को ध्यान में रखना भी नीतीश कुमार के लिए जरूरी होगा।
बिहार में नई सरकार का गठन अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। NDA की प्रचंड जीत के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं और इस बार की कैबिनेट कई मायनों में खास मानी जा रही है। बिहार में अधिकतम 36 मंत्रियों की गुंजाइश है, इसलिए सभी निगाहें इस पर टिकी हैं कि नीतीश कुमार किन चेहरों को जगह देते हैं और किस पार्टी तथा सामाजिक समूह को कितना प्रतिनिधित्व मिलता है। इस दौरान यह भी चर्चा में है कि क्या इस बार दो से अधिक डिप्टी सीएम बनाए जाएंगे, क्योंकि LJP (रामविलास) भी इस पद की दावेदार मानी जा रही है। यह भी सवाल है कि क्या पूरा मंत्रिमंडल एक बार में बनाया जाएगा या कुछ पद आगे के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे।
नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातीय संतुलन साधने की होगी, क्योंकि बिहार की राजनीति में जाति सबसे निर्णायक तत्व माना जाता है। सरकार बनाने में यह प्रयास किया जाएगा कि मंत्रिमंडल में वही संतुलन दिखे जो राज्य की आबादी में है। सवर्ण, यादव, गैर-यादव OBC, EBC, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय, सभी के प्रतिनिधित्व का हिसाब इस बार बेहद गंभीरता से तैयार किया जा रहा है।
यहां एक बड़ी समस्या यह है कि NDA के पास सिर्फ एक मुस्लिम विधायक है, इसलिए मुस्लिम प्रतिनिधित्व सीमित रह सकता है, भले ही आबादी में इनकी हिस्सेदारी ज्यादा हो। इसके साथ ही कैबिनेट के गठन में NDA के जीते हुए विधायकों की जातीय संरचना भी अहम भूमिका निभाएगी। गठबंधन में सवर्णों की संख्या सबसे अधिक है, गैर-यादव OBC, यादव, EBC और दलित–आदिवासी विधायक भी बड़ी संख्या में जीते हैं। ऐसे में कैबिनेट ऐसा बनाया जाना जरूरी होगा जिससे किसी जातीय समूह को यह महसूस न हो कि उसे नजरअंदाज किया गया है।
चुनावों में जिन वर्गों ने NDA को भारी समर्थन दिया है, उन्हें मंत्रिपद देकर पुरस्कृत करने की रणनीति पर भी काम किया जा रहा है। एग्जिट पोल के अनुसार सवर्ण, दलित-आदिवासी और गैर-यादव OBC वर्गों ने NDA के पक्ष में जबरदस्त मतदान किया। यादव और मुस्लिम समाज से भी कुछ मत NDA को मिले, लेकिन मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक ही विधायक होने के कारण फिर भी सीमित रहेगा।
नीतीश कुमार को भौगोलिक संतुलन का ध्यान रखना भी जरूरी है। बिहार के नॉर्थ और साउथ दोनों हिस्सों में सीटों का वितरण अलग है और NDA के ज्यादा विधायक नॉर्थ बिहार से आते हैं। इसलिए कैबिनेट ऐसा होना चाहिए जिसमें राज्य के हर इलाके, मिथिलांचल, तिरहुत, सारण, मगध, कोसी, पूर्णिया, पटना और भोजपुर की आवाज शामिल हो। अगर किसी एक क्षेत्र को अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया तो अन्य क्षेत्रों में असंतोष पैदा हो सकता है।
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यह कैबिनेट सिर्फ वर्तमान सरकार ही नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति को भी प्रभावित करेगी। 2027 के यूपी चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी और JDU दोनों अपनी रणनीति इस तरह बनाना चाहेंगे कि इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखे। महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की भी चर्चा है, लेकिन सिर्फ 12% महिला विधायक होने के कारण 50% हिस्सा देना संभव नहीं लगता। कुल मिलाकर नीतीश कुमार की नई कैबिनेट जाति, क्षेत्र, सहयोगी दलों और भविष्य की राजनीति का मिश्रण होगी और यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इस संतुलन को कैसे साधते हैं।






