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केरल के पत्तनमथिट्टा जिले में स्थित आरनमुला केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जगह है जहां राजनीति आस्था, स्मृति और नैतिक वैधता की छाया में अपनी कहानी लिखती है। पम्पा नदी के तट पर बसी यह भूमि अपनी विरासत और निरंतरता के प्रति बेहद सचेत है।
आरनमुला का मतदाता कभी भी जल्दबाजी में या किसी टकराव के दबाव में फैसला नहीं लेता; यहां का चुनावी व्यवहार संस्थागत विश्वास और सांस्कृतिक मर्यादाओं से तय होता है। इस क्षेत्र की जनता को उम्मीद है कि शासन परंपराओं का सम्मान करे और प्रशासनिक कुशलता के साथ कल्याणकारी योजनाएं घर-घर तक पहुंचाए। 9 अप्रैल 2026 को जब यहां मतदान होगा, तो मतदाता एक बार फिर बहुत सोच-समझकर अपने भविष्य का फैसला करेंगे।
आरनमुला की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान पम्पा नदी से जुड़ी है। राष्ट्रीय स्तर पर यह क्षेत्र अपने प्रसिद्ध पार्थसारथी मंदिर, पारंपरिक नौका दौड़ और विश्व प्रसिद्ध जीआई-टैग्ड ‘आरनमुला कन्नड़ी’ (दर्पण) के लिए जाना जाता है। यहाँ की राजनीति में सांस्कृतिक संस्थानों का नैतिक वजन बहुत अधिक है।
मंदिर समितियां और विरासत समूह यहां अनौपचारिक रूप से जनमत तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, विरासत से जुड़े व्यवसायों, प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रकम और सेवा क्षेत्र पर टिकी है। आरनमुला का मिजाज ध्रुवीकरण के बजाय विश्वसनीयता को अधिक महत्व देता है, जिससे यहाँ का चुनावी मुकाबला हमेशा शालीन और संतुलित बना रहता है।
साल 2021 का विधानसभा चुनाव आरनमुला में केवल एक सामान्य चुनाव नहीं था, बल्कि यह वामपंथी गठबंधन (LDF) की मजबूती का एक बड़ा प्रमाण था। सीपीएम नेता वीणा जॉर्ज ने 74,950 वोट हासिल कर कांग्रेस के कद्दावर नेता के. शिवदासन नायर को 19,003 वोटों के भारी अंतर से हराया था। उनकी सफलता के पीछे उनकी उच्च दृश्यता और एक सक्रिय विधायक की छवि रही है, जो अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए हमेशा सुलभ रहती हैं।
बाद में उन्हें राज्य का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया, जिससे मतदाताओं का उन पर भरोसा और बढ़ गया है। हालांकि, 2026 में उनकी असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या वे सत्ता विरोधी लहर को मात देकर अपनी इस चमक को बरकरार रख पाती हैं।
पम्पा नदी के किनारे बसे गांवों के लिए बाढ़ पर नियंत्रण और किनारों का कटाव सबसे बड़ी चिंता के विषय हैं। मानसून के दौरान बुनियादी ढांचे की कमजोरी यहां अक्सर राजनीतिक मुद्दा बन जाती है। इसके अलावा, वेटलैंड्स और नदी के पारिस्थितिक संरक्षण को लेकर यहां की जनता बहुत संवेदनशील है; पर्यावरण को किसी भी खतरे की आहट यहां तुरंत बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लेती है।
आम मतदाता स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, कल्याणकारी पेंशन की समय पर डिलीवरी और बुजुर्गों की देखभाल जैसे मुद्दों पर भी सरकार को परख रहा है। आरनमुला का मतदाता उस नेता को पसंद करता है जो परंपराओं का सम्मान करे और संकट के समय प्रशासन को मजबूती से चला सके।
केरल की 140 विधानसभा सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में आरनमुला पर कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है। जहां एलडीएफ अपनी कल्याणकारी नीतियों और प्रशासनिक निरंतरता के भरोसे मैदान में है, वहीं कांग्रेस नीत यूडीएफ अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।
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भारतीय जनता पार्टी भी यहां एक ‘तीसरे मोर्चे’ के रूप में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है, हालांकि पिछला मुकाबला मुख्य रूप से द्विध्रुवीय ही रहा था। जातिगत समीकरणों की बात करें तो नायर और ईझवा समुदाय यहां के मतदाता आधार का एक बड़ा हिस्सा हैं, जबकि ईसाई समुदाय का भी शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र के कारण काफी प्रभाव है। 4 मई को जब वोटों की गिनती होगी, तभी पता चलेगा कि आरनमुला ने विरासत के साथ विकास के किस मॉडल पर मुहर लगाई है।