बजट से पहले क्यों कांपने लगता है शेयर बाजार? 15 सालों से चला आ रहा है 'खौफ' का यह ट्रेंड, जानें असली वजह

Budget 2026: पिछले डेढ़ दशक के ट्रेंड बताते हैं कि बजट से पहले बाजार में अनिश्चितता सबसे बड़ा फैक्टर होती है। टैक्स में बदलाव, कैपेक्स घोषणाएं, सब्सिडी और राजकोषीय घाटे को लेकर स्पष्टता नहीं होती।
share market trend before budget
शेयर मार्केट, (कॉन्सेप्ट फोटो)
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Share Market Before Union Budget: केंद्रीय बजट 2026 अब कुछ ही दिनों दूर है और 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। लेकिन बजट से पहले ही शेयर बाजार में मंदी और सुस्ती का माहौल दिखाई दे रहा है। निवेशक बड़े ऐलानों से पहले सतर्क हैं और इसी वजह से बाजार में तेजी की जगह इंतजार का दौर बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि यह ट्रेंड नया नहीं है बल्कि पिछले 15 साल के आंकड़ों में भी यही पैटर्न बार-बार दिखाई देता है।

2010 से 2025 तक के डेटा पर नजर डालें तो बजट से ठीक पहले का समय अक्सर बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। निफ्टी में औसतन कमजोरी और साइडवेज मूवमेंट देखने को मिला है। कई सालों में बजट से पहले के एक महीने में नेगेटिव रिटर्न दर्ज हुए हैं। इसके साथ ही बजट के आसपास बाजार में तेज उतार चढाव भी रहता है क्योंकि हर निवेशक घोषणाओं से पहले अपनी पोजिशन सुरक्षित करना चाहता है।

पिछले डेढ़ दशक का ट्रेंड

पिछले डेढ़ दशक के ट्रेंड बताते हैं कि बजट से पहले बाजार में अनिश्चितता सबसे बड़ा फैक्टर होती है। टैक्स में बदलाव, कैपेक्स घोषणाएं, सब्सिडी और राजकोषीय घाटे को लेकर स्पष्टता नहीं होती। इसी अनिश्चितता के चलते प्रॉफिट बुकिंग बढ़ जाती है। कई बार विदेशी निवेशक भी जोखिम कम करने के लिए शॉर्ट टर्म पोजिशन को छोड़कर बाहर निकल जाते हैं। नतीजा यह होता है कि बजट से पहले बाजार पर दबाव बना रहता है।

बजट के बाद बाजार में सुधार

जैसे ही बजट पेश होता है वैसे ही तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगती है। घोषणाओं को समझने और उनके असर को आंकने में बाजार को कुछ समय लगता है। यही कारण है कि बजट के बाद के हफ्तों में हल्की रिकवरी देखने को मिलती है। निवेशक सेक्टर के हिसाब से नए अवसर तलाशते हैं और अनिश्चितता कम होने के साथ बाजार में स्थिरता लौटने लगती है। 3 से 6 महीने की अवधि में बाजार का प्रदर्शन ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। इंफ्रा खर्च, सरकारी निवेश और आर्थिक नीतियों का असर धीरे-धीरे बाजार में प्राइस इन होता है। इसलिए बजट से पहले की कमजोरी कई बार लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मौका बन जाती है। लार्जकैप शेयरों में तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्थिरता रहती है जबकि स्मॉल और मिडकैप में ज्यादा उतार चढाव देखने को मिलता है।

क्या है एक्सपर्ट्स की राय?

वेल्थमिल्स सिक्योरिटीज के क्रांति बाथिनी के अनुसार अब बजट का रोल पहले जैसा नहीं रहा है क्योंकि इनडायरेक्ट टैक्स से जुड़े बड़े फैसले अब जीएसटी काउंसिल में तय होते हैं। बाजार का फोकस अब डायरेक्ट टैक्स, कैपेक्स और फिस्कल डिसिप्लिन पर रहता है। वहीं मार्केट एनालिस्ट दीपक जसानी का कहना है कि बजट के बाद का महीना अक्सर पहले महीने के उलट व्यवहार दिखाता है और लंबी अवधि में बाजार पर ग्लोबल ट्रेंड और लिक्विडिटी का असर ज्यादा रहता है।

निवेशकों के लिए सुझाव

डेटा और ट्रेंड दोनों यही बताते हैं कि बजट से पहले बाजार में दबाव कोई असामान्य बात नहीं है। शॉर्ट टर्म में उतार चढ़ाव बना रह सकता है लेकिन लंबी अवधि में मजबूत रिटर्न की संभावना रहती है। ऐसे समय में घबराहट में फैसले लेने की बजाय संतुलित रणनीति अपनाना ज्यादा बेहतर रहता है।

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