-
गुरु, 2 जुलाई 2026 ई-पेपर
- Hindi News »
- Bihar »
- Siyasat E Bihar Congress Obc Cm Debate And 1963 History
सियासत-ए-बिहार: कांग्रेस ने बिहार को क्यों नहीं दिया पिछड़ी जाति का CM? अब तक चुभ रही 1963 की टीस
- Written By: अभिषेक सिंह
Bihar Politics: बिहार चुनाव पर हमारी स्पेशल सीरीज 'सियासत-ए-बिहार' की इस किस्त में कहानी 1963 से 1967 तक की उस सियासी उठापटक की जिसने कांग्रेस के हाथ से एक बड़ा मौका छीन लिया।

कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Siyasat-E-Bihar: बिहार में चुनावी चहल-पहल चरम पर पहुंच चुकी है। पहले चरण का मतदान हो चुका है तो दूसरे और आखिरी चरण के लिए 11 नवंबर को वोटिंग होनी है। प्रचार के आखिरी दिन भी एक तरफ एनडीए ‘जंगल राज’ के मुद्दे पर महागठबंधन को घेर रही है तो दूसरी तरफ, महागठबंधन ‘सामाजिक न्याय’ और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर सत्ताधारी NDA पर हमला बोल रहा है।
महाठबंधन की तरफ से जिस ‘सामाजिक न्याय’ की बात कांग्रेस कर रही है, वो कांग्रेस ही अब से 62 साल पहले स्वयं ही स्थापित कर सकती थी। 1963 में एक कुर्मी नेता बिहार का मुख्यमंत्री बन सकता था, लेकिन जातिगत राजनीति और कांग्रेस पार्टी की आंतरिक कलह ने ऐसा होने से रोक दिया। बिहार चुनाव पर हमारी स्पेशल सीरीज ‘सियासत-ए-बिहार’ की इस किस्त में कहानी 1963 से 1967 तक की उस सियासी उठापटक की जिसने कांग्रेस के हाथ से एक बड़ा मौका छीन लिया।
एक चूक बन गई गले की फांस
1963 में कुर्मी नेता यदि सीएम बनता तो बिहार में पहली बार एक पिछड़ा नेता सत्ता में आता। इसका श्रेय भी कांग्रेस को जाता। यह एक दूरगामी पहल भी साबित होती, क्योंकि इससे कांग्रेस को पिछड़े वर्गों में प्रभाव बढ़ाने का मौका मिला। अगर कांग्रेस ने पिछड़े वर्गों में प्रभाव स्थापित कर लिया होता, तो उस समय समाजवादी दल इतनी मज़बूत स्थिति में नहीं होते। हालांकि, कांग्रेस यह मौका चूक गई, जिसके परिणामस्वरूप 1967 में उसे हार का सामना करना पड़ा।
सम्बंधित ख़बरें
भोपाल: सरकारी स्कूलों की बदहाली पर हाईकोर्ट के नोटिस के बाद गरमाई सियासत, उमंग सिंघार ने सरकार पर बोला हमला
भोपाल: मंत्री विश्वास सारंग का कांग्रेस पर हमला, कहा- ‘मीडिया पर दबाव बनाकर नहीं चलेगी राजनीति’
कानपुर देहात: कांग्रेस की स्वागत सभा में चले लात-घूंसे, पूर्व और वर्तमान जिलाध्यक्ष के समर्थक आपस में भिड़े
“चंदा भी चुराते हैं, विधायक भी…” आगरा पहुंचते ही राजेंद्र पाल गौतम ने योगी सरकार पर बोला बड़ा हमला
4 गुटों में बंट गई कांग्रेस पार्टी
अक्टूबर 1963 में कामराज योजना के तहत मुख्यमंत्री विनोदानंद झा ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद, विनोदानंद झा ने मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का नाम आगे किया। वीरचंद पटेल कुर्मी जाति से थे और वैशाली के लालगंज से विधायक थे। उस समय, कांग्रेस पार्टी कई गुटों में बंटी हुई थी: विनोदानंद झा गुट, के.बी. सहाय गुट, महेश प्रसाद सिन्हा गुट और सत्येंद्र नारायण सिंह गुट।
के. बी. सहाय मध्य में (सोर्स- सोशल मीडिया)
ये गुट राजनीतिक लाभ के लिए लगातार टकराते रहे। राम लखन सिंह यादव यादव समुदाय के एक प्रमुख नेता थे। सुशील कुमार बाघे आदिवासियों के नेता थे। जब मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का नाम आगे बढ़ाया गया, तो सहाय गुट, महेश गुट और सत्येंद्र गुट ने इसका विरोध किया। विनोदानंद झा के विरोधी एकजुट हो गए। के.बी. सहाय सत्ता पर अपना नियंत्रण चाहते थे।
पटेल के खिलाफ एक हुए सवर्ण
झा गुट के वीरचंद पटेल को हराने के लिए सभी उच्च जाति समूह एकजुट हो गए। के.बी. सहाय, महेश प्रसाद सिन्हा और सत्येंद्र नारायण सिंह ने अपने मतभेदों के बावजूद एकजुट होकर काम किया। यह एक आश्चर्यजनक घटना थी जब कायस्थ, भूमिहार और राजपूत समूह एक राजनीतिक उद्देश्य के लिए एकजुट हुए। पिछड़ी जाति के राम लखन सिंह यादव को वीरचंद पटेल का समर्थन करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने भी उच्च जातियों का साथ दिया। यहां तक कि अनुसूचित जाति के नेता भोला पासवान शास्त्री भी के.बी. सहाय गुट में शामिल हो गए।
के.बी. सहाय बन गए मुख्यमंत्री
आदिवासी नेता सुशील कुमार बाघे ने सहाय को समर्थन देने की घोषणा की। वीरचंद पटेल इस लामबंदी को काबू नहीं कर पाए। उस समय विनोदानंद झा ने कांग्रेस से एक दूरगामी वादा किया था। हालांकि, जवाहरलाल नेहरू राजनीति में पिछड़ेपन के महत्व को समझने में विफल रहे। उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। गुटों के गठबंधन के माध्यम से, के.बी. सहाय मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।
मंत्रिपद को लेकर हुआ टकराव
मंत्रिमंडल गठन का प्रश्न उठा। मंत्रिमंडल में अधिक हिस्सेदारी के लिए नए सिरे से संघर्ष शुरू हो गया। वीरचंद पटेल ने तीन कैबिनेट मंत्री पदों की मांग की। सहाय 27 सदस्यीय मंत्रिपरिषद चाहते थे। स्थिति बिगड़ती देख, के.बी. सहाय और वीरचंद पटेल को दिल्ली बुलाया गया। जब दोनों पक्ष अड़े रहे तो कांग्रेस नेतृत्व ने निर्णय लिया कि सहाय की मंत्रिपरिषद में कुल 20 सदस्य होंगे। के.बी. सहाय और वीरचंद पटेल इस पर सहमत हो गए।
महामाया प्रसाद सिन्हा (सोर्स- सोशल मीडिया)
2 अक्टूबर, 1963 को जब सहाय मंत्रिमंडल ने शपथ ली, तो यह खेल एक बार फिर खेला गया। झा गुट से केवल वीरचंद पटेल और हरनाथ मिश्र को ही कैबिनेट मंत्री बनाया गया। हरनाथ मिश्र दरभंगा के बहेरा से विधायक थे। झा गुट से किसी को भी राज्य मंत्री नहीं बनाया गया। वीरचंद पटेल ने तीन मंत्री पदों की मांग की थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। सहाय मंत्रिमंडल में ऊंची जातियों का दबदबा था।
गुटबाजी बनी पतन का कारण!
के.बी. सहाय जोड़-तोड़ करके मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन पार्टी के भीतर गुटबाजी को खत्म नहीं कर पाए। यही गुटबाजी अंततः 1967 के चुनावों में कांग्रेस के पतन का कारण बनी। जनवरी 1967 में चुनावों से कुछ समय पहले महामाया प्रसाद सिन्हा, राजा रामगढ़ और कामाख्या नारायण सिंह, के.बी. सहाय के प्रभुत्व से असंतुष्ट होकर कांग्रेस से बगावत कर जन क्रांति दल नामक एक नई पार्टी बना ली। इस पार्टी ने चुनावों में भारी जीत हासिल की जो कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण बनी।
कांग्रेस को मिलता दूरगामी फायदा
राजनैतिक जानकारों का मानना है कि यदि, कांग्रेस दिल्ली से गुटबाजी को मैनेज कर लेती और वीरचंद पटेल को सीएम बनाने में कामयाब हो जाती तो, उसे न तो 1967 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ता, और न ही बिहार में लालू यादव ‘सामाजिक न्याय’ के पुरोधा नहीं बन पाते। क्योंकि बिहार को पहला पिछड़ी जाति का सीएम कांग्रेस ने दिया है यह बात स्थापित हो चुकी होती।
के.बी. सहाय खुद हार गए चुनाव
राजा रामगढ़ के विरोध के कारण के.बी. सहाय 1967 का चुनाव हज़ारीबाग़ सीट से हार गए। उन्होंने पटना पश्चिम सीट से भी चुनाव लड़ा, जहां महामाया प्रसाद सिन्हा ने उन्हें हरा दिया। कांग्रेस नेताओं ने उन्हें हराने के लिए अपनी ही पार्टी के भीतर विपक्षी गुटों का समर्थन करना शुरू कर दिया। यहां तक कि यह आरोप भी लगे कि पार्टी के चुनावी चंदे का इस्तेमाल कांग्रेस उम्मीदवारों को हराने के लिए किया गया। गुटबाजी नफ़रत और दुश्मनी में बदल गई। गांधी और नेहरू की पार्टी अपने ही विनाश पर तुली हुई थी।
1967 चुनाव में हार के और कारण
इससे पहले 1965 और 1966 में बारिश की कमी के कारण बिहार में भयंकर अकाल पड़ा। अनाज की कीमतें बढ़ने लगीं। कालाबाज़ारी ने जनता को और परेशान कर दिया। के.बी. सहाय सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ता गया। चुनावों से कुछ समय पहले राम मनोहर लोहिया के प्रयासों से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी), सीपीआई, सीपीएम, आरएसपी और झारखंड पार्टी ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया।
यह भी पढ़ें: सियासत-ए-बिहार: बिहार का वो CM जिसने खुद को समझ लिया शक्तिमान, राजीव गांधी खफा हुए तो चली गई कुर्सी
संयुक्त विपक्ष ने अगस्त 1966 में बिहार बंद का आयोजन किया। इस बंद को अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला। गांधी मैदान में विपक्ष की एक सभा पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। दिसंबर 1966 में मुजफ्फरपुर में पुलिस गोलीबारी में एक शिक्षक और एक छात्र की मौत हो गई। इस घटना ने बिहार में एक छात्र आंदोलन को जन्म दिया।
प्रदर्शनकारियों पर चलाईं गोलियां
5 जनवरी 1967 को पटना में एक बड़ा छात्र आंदोलन हुआ। वे कॉलेज की फीस वृद्धि का विरोध कर रहे थे। पुलिस ने गांधी मैदान के पूर्वी कोने के पास प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियां चलाईं। इससे सहाय सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा भड़क उठा। के.बी. सहाय के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की हार के कई कारण थे।
सहाय के खिलाफ बनाई जांच कमेटी
1967 में जब महामाया प्रसाद सिन्हा ने सरकार बनाई तो उन्होंने के.बी. सहाय और उनके पांच मंत्रियों (महेश प्रसाद सिन्हा, सत्येंद्र नारायण सिंह, अंबिका शरण सिंह, राघवेंद्र नारायण सिंह और राम लखन सिंह यादव) के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए टी.एल. वेंकटराम अय्यर जांच समिति नियुक्त की। जांच समिति ने इन सभी नेताओं के खिलाफ कठोर टिप्पणियां कीं।
Siyasat e bihar congress obc cm debate and 1963 history
Get Latest Hindi News , Maharashtra News , Entertainment News , Election News , Business News , Tech , Auto , Career and Religion News only on Navbharatlive.com
लेटेस्ट न्यूज़
Markandadev Conservation: गडचिरोली जिलाधिकारी ने दिए मंदिर संरक्षण के निर्देश, 2 महीने में पूरा करें निर्माण
Jul 02, 2026 | 04:30 PMExplainer: कौन थीं सरला भट्ट? 36 साल बाद अदालत पहुंचा मामला, क्या अब कश्मीरी पंडितों को मिल पाएगा न्याय?
Jul 02, 2026 | 04:27 PMReal TMC Claim: ‘हम ही असली TMC हैं’, चुनाव आयोग पहुंचा बागी गुट ने किया दावा; ममता बनर्जी की बढ़ीं मुश्किलें
Jul 02, 2026 | 04:27 PMSamsung की बढ़ेगी टेंशन, Apple का पहला Foldable iPhone Ultra करेगा एंट्री, जानिए किसमें मिलेगा ज्यादा दम?
Jul 02, 2026 | 04:25 PMOverthinking Tips: 81% भारतीय रोजाना सोचने में गंवा रहे हैं कई घंटे, जानें ओवरथिंकिंग रोकने के उपाय
Jul 02, 2026 | 04:25 PMकोटेदारों ने की मुख्य सचिव से शिकायत, सड़े गले चावल कैसे बांटे साहब, इसे जानवर ही खा सकते हैं, गरीब लोग नहीं
Jul 02, 2026 | 04:22 PMमंडला में बदहाल व्यवस्था के खिलाफ नरेंद्र का धरना; BJP सांसद और कैबिनेट मंत्री के नगर में आमजन विकास को मोहताज
Jul 02, 2026 | 04:18 PMवीडियो गैलरी

पुणे मर्डर केस में नया मोड़! केतन का मजाक उड़ाने वाली फीमेल डॉक्टर 5 साल के लिए ब्लैकलिस्ट
Jul 01, 2026 | 11:00 PM
वाराणसी दालमंडी कॉरिडोर का रास्ता साफ, भारी फोर्स के बीच 5 मस्जिदों पर कार्रवाई शुरू; देखें VIDEO
Jul 01, 2026 | 10:45 PM
Atiq Ahmed: अतीक की जमीन पर बनेगा गरीबों का आशियाना, PDA लाने जा रहा प्लान; देखें VIDEO
Jul 01, 2026 | 10:34 PM
‘मरने के बाद कोई…’, सना खान के ‘कयामत’ वाले VIDEO ने इंटरनेट पर मचाया बवाल; सोशल मीडिया पर खूब हो रहा वायरल
Jul 01, 2026 | 08:43 PM
Indus Water Treaty: भारत की सिंधु जल स्ट्राइक से पाकिस्तान में डर! आने वाला है बड़ा संकट?-VIDEO
Jul 01, 2026 | 06:30 PM
दिहाड़ी मजदूर की बेटी को मिला 21 करोड़ का टैक्स नोटिस, पैन कार्ड के दुरुपयोग से हैरान परिवार, video वायरल
Jul 01, 2026 | 02:49 PM














