गौरा बौराम विधानसभा चुनाव 2025: बाढ़ और पलायन के बीच भाजपा की बढ़त, आरजेडी की चुनौती बरकरार
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच दरभंगा जिले की गौरा बौराम विधानसभा सीट एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए रणनीतिक रूप से अहम बन गई है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
बिहार विधानसभा सीट प्रोफाइल (डिजाइन इमेज)
Bihar Assembly Election 2025: बाढ़, पलायन और रोजगार जैसे जमीनी मुद्दों के बीच यहां का चुनावी मुकाबला भाजपा और आरजेडी के बीच दिलचस्प होता जा रहा है। स्वर्णा सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी को इस सीट पर अतिरिक्त मजबूती मिली है, जबकि आरजेडी मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे वापसी की कोशिश में है।
गौरा बौराम विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन आयोग की सिफारिश पर अस्तित्व में आई। इसके बाद से यहां तीन विधानसभा चुनाव (2010, 2015, 2020) हो चुके हैं। 2010 और 2015 में जेडीयू ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। 2020 में वीआईपी पार्टी की प्रत्याशी स्वर्णा सिंह ने आरजेडी के अफजल अली खान को हराकर सीट अपने नाम की। 2022 में स्वर्णा सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया, जिसे उनकी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए स्वाभाविक कदम माना गया। लोकसभा चुनावों में भाजपा इस क्षेत्र में लगातार बढ़त बनाए हुए है, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति और मजबूत मानी जा रही है।
कुछ खास नहीं हैं मतदाताओं के आंकड़े
चुनाव आयोग के 2024 के आंकड़ों के अनुसार गौरा बौराम विधानसभा क्षेत्र की कुल जनसंख्या 4,41,617 है। इनमें पुरुषों की संख्या 1,36,597 और महिलाओं की संख्या 1,24,440 है। कुल मतदाता 2,61,037 हैं, जो इस बार के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
महिला मतदाताओं की संख्या भी काफी है, और स्थानीय मुद्दों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर उनका रुख चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
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बाढ़ और पलायन की मार
गौरा बौराम और किरातपुर प्रखंडों के साथ-साथ बीरौल प्रखंड की 12 ग्राम पंचायतों को मिलाकर बना यह क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण और कृषि प्रधान है। पास से बहने वाली कमला नदी खेती को सहारा देती है, लेकिन हर साल की मौसमी बाढ़ यहां की खेती और विकास दोनों को प्रभावित करती है। औद्योगिक इकाइयों की अनुपस्थिति के कारण यह क्षेत्र कम औद्योगीकृत माना जाता है, जिससे पलायन की समस्या भी बढ़ी हुई है। युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। यही कारण है कि रोजगार और पलायन इस बार के चुनाव में प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं।
धान, गेहूं, मक्का और सब्जियों की खेती यहां की अर्थव्यवस्था का आधार है, लेकिन बाढ़ के कारण फसल चक्र में व्यवधान आता है। सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं और सड़क संपर्क भी कई गांवों में कमजोर है।
भाजपा की बढ़त पर भारी पड़ सकती है आरजेडी की रणनीति
पिछले चुनावी रुझानों के अनुसार भाजपा यहां मजबूत स्थिति में है। स्वर्णा सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी को अतिरिक्त बढ़त मिली है। भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन इस विधानसभा सीट पर उसकी स्थिति को मजबूत करता है। वहीं आरजेडी मुस्लिम-यादव समीकरण पर भरोसा करती है, लेकिन राह आसान नहीं है। अफजल अली खान जैसे पुराने चेहरे को फिर से मैदान में उतारने की संभावना है, लेकिन भाजपा के सामने उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रामीण मतदाता भाजपा को एक स्थिर विकल्प मानते हुए उसकी ओर झुकते नजर आ रहे हैं। विकास, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर भाजपा का फोकस इस बार उसे लाभ दिला सकता है।
किसका होगा पलड़ा भारी
गौरा बौराम विधानसभा सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। भाजपा अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में है, जबकि आरजेडी वापसी की राह तलाश रही है। बाढ़, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे मतदाताओं के लिए अहम हैं, और इन पर किस पार्टी की नीति उन्हें भरोसेमंद लगेगी, यही तय करेगा चुनावी परिणाम।
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कुल मिलाकर देखा जाए तो 2025 के विधानसभा चुनाव में गौरा बौराम सीट पर भाजपा का पलड़ा फिलहाल भारी दिख रहा है, लेकिन अंतिम फैसला जनता के हाथ में है । उनका रुख ही तय करेगा इस सीट का भविष्य और इलाके का अगला जनप्रतिनिधि।
