1990 की वो रात… जब दिल्ली से आया एक फोन और बिहार के CM बन गए लालू प्रसाद यादव, जानें क्या है पूरी कहानी
Lalu Prasad Yadav: बिहार के दिग्गज राजनेता लालू प्रसाद यादव के 78वें जन्मदिन पर जानिए 1990 का वह दिलचस्प किस्सा, जब उन्होंने देश के प्रधानमंत्री से टकराकर पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी।
- Written By: अक्षय साहू
लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
Lalu Prasad Yadav 78th Birthday: कहते हैं राजनीति में समय और समीकरण पल भर में बदल जाते हैं। लेकिन बिहार की राजनीति में एक दौर ऐसा भी आया, जब हर समीकरण का केंद्र सिर्फ एक नाम था लालू प्रसाद यादव। मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में पीछे दिख रहे लालू ने ऐसा दांव खेला कि सत्ता की पूरी बाजी ही पलट गई। 1990 का वह चुनाव, वी.पी. सिंह की नाराज़गी, पार्टी के भीतर बगावत और महज तीन वोटों से मिली जीत… यह कहानी है उस राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक की जिसने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी।
जीवन के 77 बसंत देख चुके लालू प्रसाद यादव आज अपना 78वां जन्मदिन मना रहे हैं। लालू परिवार में खुशी का माहौल है। वहीं आररेडी समर्थक उनके घर के बाहर ढोल-नगाड़े बजाकर जश्न मना रहे हैं।
दो बार संभाला मुख्यमंत्री का पद
अपने जीवन के 77 बसंत देख चुके लालू प्रसाद यादव आज अपना 78वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस मौके पर लालू परिवार में खुशी का माहौल है, उनके समर्थक उनके घर के बाहर ढोल नगाड़े बजाकर जश्न मना रहे हैं। लालू प्रसाद यादव कुल दो बार (1990-1995 और 1995-1997) बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक सच यह भी है कि 2005 में नीतिश कुमार बनने से पहले तक सत्ता की चाबी हमेशा उनकी जेब में रही।
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दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं लालू प्रसाद यादव (सोर्स- सोशल मीडिया)
हालांकि, लालू के पहली बार मुख्यमंत्री बनने की कहानी किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। क्योंकि लालू ने मुख्यमंत्री बनने के लिए न सिर्फ अपना राजनीति करियर दांव पर लगा दिया था, बल्कि इसके लिए सीधे प्रधानमंत्री से टकरा गए थे।
लालू को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहते थे वीपी सिंह
बात 1990 बिहार विधानसभा चुनाव की है। 324 सीटों में 132 सीटें जनता दल राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और अपनी सहयोगी पार्टी सीपीआई के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली थी। लालू प्रसाद यादव जो खुद को उस समय बिहार में जनता दल का सबसे बड़ा चेहरा मानते थे, उन्हें लगा कि अब उनका मुख्यमंत्री बनना तय है, क्योंकि वो इससे पहले विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके थे, साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के भरोसेमंद थे। लेकिन वीपी सिंह कुछ और ही करने का मन बना चुके थे।
रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते वीपी सिंह (सोर्स- सोशल मीडिया)
वीपी सिंह लालू की जगह एक दलित नेता को बिहार का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। उनका कहना था कि लालू तो विधानसभा के सदस्य भी नहीं हैं, फिर सीएम बनने का सवाल ही नहीं उठता। वो लालू की जगह रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। जो 1979-80 के दौरान कुछ समय के लिए बिहार के मुख्य़मंत्री रह चुके थे। वीपी सिंह को अजीत सिंह और बाकी नेताओं का समर्थन भी मिल चुका था। ऐसे में लालू को अपने हाथ से मुख्यमंत्री की कुर्सी फिसलती नजर आने लगी।
लालू ने दिखाए बगावती तेवर
वीपी सिंह ने नेताओं के समर्थन मिलने के बाद अतीत सिंह, जॉर्ज फर्नांडीस और सुरेंद्र मोहन को पटना भेजा ताकि तीनों मिलकर विधायकों को रामसुंदर दास के पक्ष में लामबंद कर सके। लेकिन लालू यादव आलाकमान के फैसले को मानने के मूड में बिल्कुल नहीं थे। उन्होंने एक बड़ा दांव खेलते हुए विधायक दल का नेता चुनने के लिए चुनाव करवाए जाने की मांग कर आलाकमान के सामने रख दी। वीपी सिंह पहले ही खुद को जीता हुआ मान चुके थे, उन्हें लगा था कि लालू अपने समर्थन में विधायकों को किसी हाल अपने पक्ष में नहीं कर पाएंगे। लेकिन वो इस बात से अंजान थे कि लालू ने पहले ही जनता दल की गुटबाजी का फायदा उठाते हुए बड़ी चाल चल चुके हैं।
चंद्रशेखर के साथ मिलकर पलटी बाजी
दरअसल वीपी सिंह के समर्थन से रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनता देख, लालू भागे-भागे दिल्ली पहुंचे। जहां उन्होंने सबसे पहले जनता दल से कद्दावर नेता देवी लाल को अपने पक्ष में किया और फिर चंद्रशेखर सिंह के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचे। लालू प्रसाद यादव ने राजनीतिक रूप से पूरी जिंदगी चंद्रशेखर का विरोध किया था। हालांकि उनके आपसी रिश्ते बहुत अच्छे थे। लालू को पता था कि एक ही पार्टी में होने के बावजूद चंद्रशेखर वीपी सिंह के धुर विरोधी हैं।
वीपी सिंह के खिलाफ चंद्रशेखर ने लालू यादव का किया था समर्थन (सोर्स- सोशल मीडिया)
इसलिए लालू चंद्रशेखर के पास पहुंचे और लगभग शिकायत करते हुए कहा कि, यह राजा हमारी संभावनाओं को खत्म करने पर तुला हुआ है.. उन्होंने लगभग एक छोटे बच्चे की तरह शिकायत की, ‘‘कृपया हमारी मदद कीजिए, नहीं तो वीपी सिंह अपने आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बना देंगे। कहते हैं कि लालू की बात सुनने के बाद चंद्रशेखर ने उन्हें आश्वासन दिया कि बिहार के मुख्यमंत्री वही बनेंगे।
चुनाव वाले दिन हुआ असली खेल
चंद्रशेखर के आश्वासन के बाद लालू पटना लौट गए। इधर चंद्रशेखर बिहार में अपने चेले रघुनाथ झा को फोन किया और चुनाव के दिन मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोकने का आदेश दे दिया। साथ ही उन्होंने यह भी हिदायत कि इसके बारे में चुनाव की तारीख से पहले किसी को कुछ भी न पता चले। इसके बाद चंद्रशेखर ने लालू की मदद के लिए मुलायम सिंह यादव और शरद यादव को भी पटना भेजा। ताकि वो लालू के लिए समर्थन जुटा सकें। सारा खेल पर्दे के पीछे चल रहा था।
ऐन मौके पर रघुनाथ झा सीएम पद पर ठोका था दावा (सोर्स- सोशल मीडिया)
इसी तरह विधायक दल के नेता के चुनाव की तारीख भी आ गई। लेकिन ऐन मौके पर चंद्रशेखर के कहे अनुसार रघुनाथ झा ने मुख्यमंत्री के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी। इससे जिन दलित विधायकों का समर्थन सीधे रामसुंदर दास को मिलने वाला था वो अब दो हिस्सों में बंट गया और लालू तीन वोटों से चुनाव जीत गए।
अजीत की आखिरी चाल भी पस्त
लालू यादव के विधायक दल का नेता चुने जाने से अजीत सिंह गुस्से से लाल हो गए और उन्होंने एक आखिरी दांव चलते हुए गवर्नर मोहम्मद यूनुस सलीम को दिल्ली बुला लिया। जिसकी खबर लालू यादव को लग गई। वो भागे-भागे पटना एयरपोर्ट पहुंचे ताकि गवर्नर को रोका जा सके लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही मोहम्मद यूनुस का प्लेन टेकऑफ कर चुका था।
देवी लाल के फोन से पस्त हुए वीपी सिंह (सोर्स- सोशल मीडिया)
लालू ने ऐसे में अपने दूसरे तुरुप के एक्के का इस्तेमाल किया और अजीत की हरकत की कहानी फोन कर देवी लाल को सुनी दी। और कहा कि वो विधायक दल के नेता चुने गए हैं, लेकिन अजीत सिंह उन्हें शपथ नहीं लेने दे रहे हैं।
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कहते हैं कि इतने सुनते ही देवी लाल ने सीधे प्रधानमंत्री वीपी सिंह को फोन मिलाया और चेतावनी दी अगर लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री की शपथ नहीं दिलाया गया तो वीपी सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगे। कहा जाता है कि अपनी कुर्सी पर खतरा देख वीपी सिंह ने मोहम्मद यूनुस सलीम को तुरंत वापस पटना भेजा और लालू को शपथ दिलाने का आदेश दिया। इसके बाद गवर्नर वापस पटना लौटे और 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई और इस तरह लालू पहली बार बिहार की सबसे बड़ी कुर्सी पर पहुचें और अगले 15 साल तक ये कुर्सी लालू परिवार के पास ही रही।
