बिहार में नीतीश राज खत्म! सुशासन बाबू के उन संघर्षों की कहानी जो आपने शायद ही सुनी होगी, जानिए पूरी टाइमलाइन
Nitish Kumar Biography: नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ बिहार की राजनीति में एक लंबे युग का समापन होने जा रहा है। बिहार से सुशासन बाबू सालों के संघर्ष के बाद इस मुकाम तक पहुंचे। जानिए उनका पूरा सफर।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
नीतीश कुमार, फोटो- सोशल मीडिया
Nitish Kumar Timeline: पटना की सड़कों पर आज एक अलग ही सुगबुगाहट महसूस की जा रही है। मुख्यमंत्री आवास के बाहर सुरक्षा का सख्त पहरा और सचिवालय के अधिकारियों की दौड़धूप साफ तौर पर इशारा कर रही है कि बिहार की तकदीर में आज कुछ नया और ऐतिहासिक लिखा जाने वाला है। 14 अप्रैल 2026 की यह तारीख बिहार के सियासी इतिहास के पन्नों में इसलिए दर्ज होने जा रही है क्योंकि आज सुशासन बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार अपनी दो दशक लंबी सत्ता की पारी को विराम देकर राजभवन की ओर कूच करने जा रहे हैं।
बिहार की राजनीति ने बीते कई दशकों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन आज का दिन इसलिए सबसे अलग है क्योंकि पहली बार देश के इस बड़े सूबे में भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने जा रहा है। पटना के 5 देशरत्न मार्ग स्थित सरकारी आवास पर सुबह से ही सुरक्षा का ऐसा अभेद्य घेरा बना दिया गया है। वहां से गुजरने वाला हर शख्स समझ रहा है कि सत्ता के हस्तांतरण की पटकथा पूरी तरह तैयार हो चुकी है।
नीतीश कुमार कैसे कहलाए सुसाशन बाबू?
बिहार की माटी ने देश को कई दिग्गज राजनेता दिए हैं, लेकिन नीतीश कुमार का व्यक्तित्व उन सबमें अपनी एक अलग ही चमक रखता है। आज जब हम आधुनिक बिहार की बात करते हैं, तो विकास और सुशासन के साथ जिस नेता का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह नीतीश कुमार ही हैं। उनके इस लंबे राजनीतिक सफर की जड़ें केवल रैलियों या भाषणों में नहीं, बल्कि पटना की उन गलियों और शिक्षण संस्थानों में भी हैं जहां उन्होंने समाज को बदलने का सपना देखा था। यह कहानी केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं है, बल्कि एक ऐसे जुझारू व्यक्तित्व की है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और अपनी नैतिकता को हमेशा राजनीति से ऊपर रखा। उनके जीवन के पन्ने पलटते हुए हमें अहसास होता है कि कैसे एक युवा छात्र अपनी मेहनत और दूरदृष्टि के दम पर पूरे प्रदेश की तकदीर बदलने की कूवत रखता है।
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इंजीनियरिंग कॉलेज से जेपी आंदोलन का वो क्रांतिकारी दौर
नीतीश कुमार के व्यक्तित्व का निर्माण उनके छात्र जीवन के दौरान ही शुरू हो गया था। उन्होंने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल की थी। उस समय का यह कॉलेज आज राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान, पटना के नाम से अपनी धाक जमा रहा है। एक इंजीनियर के रूप में उनका करियर फिक्स था, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।
साठ और सत्तर के दशक में जब पूरा देश बदलाव की बयार महसूस कर रहा था, तब नीतीश कुमार भी चुप नहीं बैठे। साल 1974 और 1977 के बीच उन्होंने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी आंदोलन ने उन्हें राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ा। उन दिनों वे महान समाजसेवी और कद्दावर राजनेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बेहद करीब रहे, जिन्हें लोग प्यार से छोटे साहब कहते थे। यही वह दौर था जब उन्होंने राजनीति के व्यावहारिक गुरु सीखे।
कैसे मिली पहली चुनावी जीत और क्यों दिया इस्तीफा?
नीतीश कुमार का चुनावी सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें पहली बार बिहार विधानसभा के लिए साल 1985 में चुना गया। यह जीत उनके लिए संजीवनी की तरह थी, क्योंकि इसने उनके राजनीतिक करियर को एक नया आयाम दिया। इसके ठीक दो साल बाद, 1987 में वे युवा लोकदल के अध्यक्ष बने और फिर 1989 में उन्हें बिहार में जनता दल का सचिव बनाया गया। उसी वर्ष उन्होंने नौंवी लोकसभा के सदस्य के रूप में संसद की दहलीज पर कदम रखा।
उनकी काबिलियत देखते हुए 1990 में उन्हें पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृषि राज्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1991 में वे दोबारा लोकसभा पहुंचे और संसद में जनता दल के उपनेता बने। राजनीति में आने वाले उतार-चढ़ावों के बीच वे 1998-99 में केंद्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे। लेकिन अगस्त 1999 में गैसाल में हुई एक रेल हादसे ने उनकी नैतिकता की बड़ी परीक्षा ली। उस हादसे से वे इतने आहत हुए कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
मुख्यमंत्री की कुर्सी और महज सात दिनों का कार्यकाल
साल 1999 के लोकसभा चुनाव बिहार की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुए। भाजपा और जदयू के गठबंधन ने राजद के किले में सेंध लगा दी थी और 324 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब 199 पर बढ़त हासिल कर ली थी। ऐसा माना जा रहा था कि लालू-राबड़ी शासन अब अंत के करीब है। इसी माहौल के बीच सन 2000 में विधानसभा चुनाव हुए। एनडीए के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कई पेंच फंसे हुए थे, लेकिन अंततः नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश कर दिया गया।
हालांकि राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत किसी के पास स्पष्ट नहीं था। नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ली, लेकिन उनके पास जादुई आंकड़ा नहीं था। 324 सदस्यीय सदन में एनडीए और उसके सहयोगियों के पास केवल 151 विधायक थे, जबकि बहुमत के लिए 163 की जरूरत थी। अपनी संख्या साबित करने से पहले ही, नैतिकता का सम्मान करते हुए नीतीश कुमार ने केवल सात दिनों के भीतर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
पंद्रह साल पुराने शासन का अंत और ‘सुशासन’ की शुरुआत
सात दिनों के उस छोटे से कार्यकाल ने नीतीश कुमार के भीतर एक नई ऊर्जा भरी। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बाढ़ की सीट से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने नालंदा से अपनी जीत बरकरार रखी। असली परिवर्तन नवंबर 2005 में आया, जब उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के पंद्रह साल पुराने शासन को उखाड़ फेंकने में सफलता हासिल की। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी हुई और बिहार में विकास के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 2010 के विधानसभा चुनाव में तो उन्होंने अपनी सरकार के विकास कार्यों के दम पर भारी बहुमत हासिल किया और दोबारा मुख्यमंत्री बने।
हालांकि 2014 के संसदीय चुनावों में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने एक बार फिर पद से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था। उनके अब तक के कार्यकाल में बिहार ने कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं, जिसमें 2023 में हुई जाति आधारित गणना भी शामिल है। उनकी राजनीति हमेशा समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने पर केंद्रित रही है, जिसने उन्हें बिहार की जनता का अटूट विश्वास दिलाया है।
एक कहानी यह भी है
पत्नी से उधार लेकर शुरू हुआ था नीतीश का सफर
आज जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने जा रहे हैं, तो उनके राजनीतिक सफर की वो पुरानी कहानियां फिर से ताजा हो गई हैं जिन्होंने उन्हें जमीन से उठाकर सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। बात अस्सी के दशक की है, जब जेपी आंदोलन से निकले युवा नेताओं की एक नई पौध बिहार की राजनीति को बदलने का सपना देख रही थी।
नीतीश कुमार भी उसी दौर के एक संघर्षशील नेता थे, लेकिन उनकी शुरुआती राह बिल्कुल भी आसान नहीं थी। साल 1977 और 1980 के विधानसभा चुनावों में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था। लगातार दो बार मिली इस हार ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। आलम यह था कि उनके पास अगले चुनाव के लिए संसाधन तक नहीं बचे थे। यही वह मोड़ था जब उनकी पत्नी मंजू देवी उनके लिए ढाल बनकर खड़ी हुईं। 1985 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने राजनीति छोड़ने तक का मन बना लिया था। लेकिन उन्होंने एक आखिरी कोशिश करने का फैसला किया और अपनी पत्नी से 20 हजार रुपये उधार लिए।
पहली जीत 22,000 वोटों से
उस समय उन्होंने मंजू देवी को एक वचन दिया था कि अगर वह इस बार भी चुनाव हार गए, तो वह हमेशा के लिए राजनीति को अलविदा कह देंगे। वह चुनाव उनके लिए करो या मरो की स्थिति वाला था। नीतीश कुमार ने हरनौत सीट से अपनी पूरी ताकत झोंक दी और अंततः 22 हजार से ज्यादा वोटों से जीतकर विधानसभा पहुंचे। वह 20 हजार रुपये का उधार और पत्नी को दिया गया वह वचन ही था जिसने बिहार को एक ऐसा नेता दिया जिसने आगे चलकर राज्य की तस्वीर बदल दी।
सम्राट चौधरी के आवास पर बढ़ी हलचल
जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही हैं, पटना के सियासी गलियारों में सम्राट चौधरी का नाम सबसे ऊपर चमक रहा है। सम्राट चौधरी के आवास के बाहर की सुरक्षा और वहां प्रशासनिक अधिकारियों की बढ़ती आवाजाही ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि वह भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार ने खुद कई मंचों से यह संकेत दिए थे कि अब सम्राट चौधरी ही बिहार की कमान संभालेंगे। सम्राट चौधरी वर्तमान में गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं और उन्हें पार्टी के भीतर पिछड़ों के एक बड़े और सशक्त चेहरे के रूप में देखा जाता है।
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सत्ता के इस गलियारे में यह चर्चा आम है कि नीतीश कुमार के प्रधान सचिव दीपक कुमार ने हाल ही में सम्राट चौधरी से मुलाकात की थी, जिसे महज शिष्टाचार नहीं बल्कि सत्ता के नए ब्लूप्रिंट पर अंतिम मुहर माना जा रहा है। सम्राट चौधरी का राजनीतिक कद पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ा है और केंद्रीय नेतृत्व ने भी कई बार उन्हें बड़ा पद देने के संकेत दिए थे।
पिछड़ों और दलितों को साधने का नया सियासी दांव
हालांकि सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे है, लेकिन भाजपा की रणनीति हमेशा चौंकाने वाली रही है। पार्टी इस बार केवल बिहार ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों के वोट बैंक पर भी नजर गड़ाए हुए है। बिहार में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है और चर्चा है कि पार्टी इस समूह से भी किसी चेहरे को सामने ला सकती है। अगर बिहार में किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों और वहां के जाटव मतदाताओं पर पड़ेगा। इस कड़ी में जनक राम जैसे नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं, जो रविदास समुदाय से आते हैं और पूर्व में मंत्री भी रह चुके हैं।
इसके अलावा, अति पिछड़ी जाति के नेताओं जैसे प्रमोद चंद्रवंशी और संजीव चौरसिया के नाम भी चर्चा में हैं। प्रमोद चंद्रवंशी विद्यार्थी परिषद के पुराने सिपाही रहे हैं और संघ के साथ उनके गहरे जुड़ाव को देखते हुए उनकी दावेदारी को कम नहीं आंका जा सकता। वहीं संजीव चौरसिया का परिवार भी दशकों से पार्टी को समर्पित है। भाजपा आलाकमान इस बात को अच्छी तरह समझता है कि बिहार में सत्ता का रास्ता जातियों के समीकरण से होकर ही गुजरता है। इसलिए मुख्यमंत्री के चयन में केवल प्रशासनिक क्षमता ही नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है।
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क्या भाजपा का यह फैसला बिहार की तस्वीर बदल देगा
बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। नीतीश कुमार ने दोपहर 3:15 बजे का समय राज्यपाल से मिलने के लिए तय किया है और उनके इस्तीफे के साथ ही करीब दो दशक लंबे एक युग का समापन हो जाएगा। नीतीश कुमार अब राज्यसभा के जरिए दिल्ली की राजनीति में अपनी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं, लेकिन उनकी विरासत और उनके द्वारा खड़ा किया गया विकास का ढांचा नए मुख्यमंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों होगा। जदयू की ओर से नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को नई कैबिनेट में शामिल करने की चर्चा भी जोरों पर है, ताकि गठबंधन के पुराने और नए साथियों के बीच तालमेल बना रहे।
