बिना MLA वाली पार्टी का नेता बना बिहार की राजनीति का ‘बाजीगर’, सहनी के लिए दोनों तरफ खींचतान
Bihar की राजनीति में मुकेश सहनी ने 2013 के आसपास कदम रखते हुए उन्होंने 2018 में पार्टी का गठन कर दिया था। वे खुद को 'सन ऑफ मल्लाह' के रूप में पेश करते है। आज राज्य की सियासत में अहम रोल में है।
- Written By: सौरभ शर्मा
मुकेश सहनी के लिए दोनों गठबंधनों में खींचतान (फोटो- सोशल मीडिया)
Mukesh Sahni VIP Party Dominance: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही सियासी पारा चढ़ गया है। पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 17 अक्टूबर है, लेकिन एनडीए और महागठबंधन, दोनों खेमों में सीटों का बंटवारा अभी तक फाइनल नहीं हुआ है। इस सियासी घमासान के केंद्र में विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी हैं। इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार दीप्तिमान तिवारी की रिपोर्ट के अनुसार, बिना एक भी विधायक वाली उनकी पार्टी के लिए दोनों बड़े गठबंधन किसी भी कीमत पर उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं, जिससे सहनी की सौदेबाजी की ताकत काफी बढ़ गई है।
मुकेश सहनी इस मौके का पूरा फायदा उठाते हुए महागठबंधन से करीब 30 सीटों की मांग कर रहे हैं, हालांकि उन्हें 10 से 15 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं दूसरी ओर, एनडीए भी उन्हें वापस अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश कर रहा है और उन्हें ऐसी सीटें देने का वादा कर रहा है, जहां जीत की संभावना ज्यादा हो। अगर सहनी एनडीए में जाते हैं, तो यह 2020 विधानसभा चुनाव की स्थिति जैसा ही होगा, जब उन्होंने महागठबंधन द्वारा दी जा रही सीटों से नाखुश होकर एनडीए का दामन थाम लिया था।
‘मल्लाह का बेटा’ कैसे बना सियासत का अहम चेहरा
मूल रूप से दरभंगा के रहने वाले 44 वर्षीय मुकेश सहनी कभी बॉलीवुड में सेट डेकोरेटर का काम करते थे। उन्होंने 2013 के आसपास राजनीति में कदम रखा और 2018 में वीआईपी पार्टी बनाई। उन्होंने खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ के रूप में स्थापित किया। 2014 में उन्होंने नरेंद्र मोदी का समर्थन किया, तो 2015 तक वे भाजपा के स्टार प्रचारक बन गए। लेकिन 2019 आते-आते वे आरजेडी के साथ चले गए। सहनी के लिए यह खींचतान उनके मल्लाह समुदाय के राजनीतिक महत्व को दर्शाती है, जो कि निषाद समाज का एक बड़ा हिस्सा है और अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में आता है।
सम्बंधित ख़बरें
‘इसलिए हमने इसका विरोध किया…’, राज्यसभा चुनाव के मतदान से नदारद रहे कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद का आया बयान
बिहार में राज्यसभा की वोटिंग से गायब RJD विधायक फैसल रहमान का बयान आया सामने, जानें क्या कहा
‘कांग्रेस के सभी सदस्य बिगड़ गए हैं’, संसद में विपक्ष की ‘नाश्ता पार्टी’ पर भड़के किरेन रिजिजू
ओम बिरला के बाद ज्ञानेश कुमार की बारी…CEC के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी, 200 प्लस सांसदों ने किए साइन
यह भी पढ़ें: CJI गवई पर हमला करने वाले वकील का ‘दलित कार्ड’! तारीफ कर पूर्व कमिश्नर ने अब क्यों मांगी माफी?
क्यों निर्णायक है निषाद समुदाय?
2023 के बिहार जाति सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में निषाद समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 9.6% है, जिसमें सहनी की अपनी मल्लाह उप-जाति 2.6% है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, खगड़िया और वैशाली जैसे कई जिलों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है। एक आरजेडी नेता के अनुसार, निषाद एक अहम वोट बैंक हैं और इन चुनावों में अति पिछड़ी जातियों पर ध्यान केंद्रित करने से उन्हें अपने साथ लाना गठबंधन का सामाजिक आधार बढ़ा सकता है। यही वजह थी कि 2020 में भी भाजपा ने वीआईपी को 11 सीटें दी थीं।
