हार की 'युवा ब्रिगेड' में अकेला एक चेहरा की चमका (फोटो- सोशल मीडिया)
Bihar Election Analysis: बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ‘युवा ब्रिगेड’ के तीन बड़े चेहरों की तकदीर का फैसला कर दिया है। तीनों ने ही बिहार की सियासत बदलने की बात कही, लेकिन करिश्मा सिर्फ एक ही कर पाया। तेजस्वी यादव अपने बड़े वादों में उलझ गए और जनता का भरोसा नहीं जीत पाए, तो प्रशांत किशोर के तीखे और तेजतर्रार इरादे जो कि वो बिहार की सूरत बदलने के शुरू से बदलने के दावे करते रहे जो हवा-हवाई साबित हुए। इन दोनों के फीके प्रदर्शन के बीच, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान एनडीए के ‘छुपे रुस्तम’ बनकर उभरे और इस चुनाव के असली युवा खिलाड़ी या कहें कि असली युवा फैक्टर साबित हुए।
लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव के सामने ‘जंगल राज’ की छवि से बाहर निकलने की सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसमें वह नाकाम रहे। उन्होंने अपराध मुक्त राजनीति की बात तो की, लेकिन RJD के 76% टिकट आपराधिक छवि वालों को ही दिए। हर घर से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का वादा भी किया, पर इसका कोई ब्लूप्रिंट नहीं दे पाए, जिससे जनता उन पर भरोसा नहीं कर सकी। इतना ही नहीं, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी यादव उम्मीदवारों को उतारने से भी असंतोष पनपा जो नैया को ले डूबा।
बिहार बदलने की सोच लेकर निकले प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। उनकी जनसभाओं में भीड़ तो खूब जुटी, लेकिन वह वोटों में नहीं बदल सकी। पीके का यह दावा कि ‘जदयू को 25 से अधिक सीटें मिलीं तो राजनीति छोड़ दूंगा’, उन्हीं पर उल्टा पड़ गया। समाज के अच्छे लोगों को टिकट देने का वादा भी खोखला निकला, क्योंकि पार्टी के 231 प्रत्याशियों में से 108 पर क्रिमिनल केस दर्ज थे।
तेजस्वी और पीके के दावों के ठीक उलट, चिराग पासवान ने ‘बिहारी फर्स्ट’ नारे से युवाओं को साधा। खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हनुमान’ कहने वाले चिराग ने इस बार ‘बागी’ नहीं, बल्कि ‘युवा बिहारी’ नेता की छवि पेश की। उन्होंने टिकट बांटने में सिर्फ जाति को आधार नहीं बनाया, बल्कि अगड़ी जाति, ईबीसी और महिला उम्मीदवारों को भी मौका दिया। नतीजा यह रहा कि उनकी पार्टी ने 29 में से 19 सीटें जीतीं और कई ऐसी सीटें भी एनडीए की झोली में डाल दीं, जहां भाजपा का सूखा था। इस करिश्मे से NDA में चिराग की स्थिति और मजबूत होगी।
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वहीं, कांग्रेस इस चुनाव में 15 साल बाद अपने सबसे बदतर प्रदर्शन पर लौट आई और 6 सीटों पर सिमट गई। स्थानीय मुद्दों के बजाय अदाणी और वोट चोरी जैसे मुद्दों को प्रमुखता देना पार्टी को भारी पड़ा, जिससे अब इंडिया गठबंधन में राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं।