मसौढ़ी विधानसभा: आर्यभट्ट की धरती पर RJD का वर्चस्व, क्या रेखा देवी लगाएंगी जीत की हैट्रिक?
Bihar Assembly Elections: 2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशों पर यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद इसका राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया। पिछले एक दशक से मसौढ़ी पर राजद का कब्जा है।
- Written By: मनोज आर्या
बिहार विधानसभा चुनाव 2025, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Masaurhi Assembly Constituency: बिहार की राजधानी पटना से दक्षिण में स्थित मसौढ़ी विधानसभा सीट (अनुसूचित जाति आरक्षित) का इतिहास जितना गौरवशाली है, इसकी वर्तमान राजनीति उतनी ही केंद्रित है। यह वह भूमि है जिसे कभी ‘तारेगना’ (तारों की गणना का स्थान) कहा जाता था, जहां महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने छठी शताब्दी में खगोल वेधशाला स्थापित की थी। आज यह सीट पटना जिले के पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और पूरी तरह से राजद बनाम जदयू की सीधी लड़ाई का केंद्र बन चुकी है।
मसौढ़ी राजद का अभेद्य किला
2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशों पर यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद इसका राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गया। पिछले एक दशक से मसौढ़ी पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का सिक्का चल रहा है। राजद उम्मीदवार रेखा देवी यहां की लगातार दो बार की विधायक हैं और 2025 में जीत की हैट्रिक लगाने की तैयारी में हैं।
जीत का सियासी समीकरण
2020 के विधानसभा चुनाव में रेखा देवी ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की नूतन पासवान को भारी मतों (98,696 वोट) से हराकर अपनी मजबूत पकड़ साबित की थी। राजद की लगातार सफलता के पीछे यहां के यादव और दलित मतदाताओं का मजबूत समीकरण काम करता रहा है, जिससे यह सीट अब राजद के लिए एक ‘सुरक्षित सीट’ बन गई है।
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जातीय फैक्टर और सीधी टक्कर
मसौढ़ी की राजनीति पूरी तरह से जातिगत गोलबंदी पर टिकी है। 2020 के आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,71,238 मतदाताओं में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 18.59 प्रतिशत है, जो चुनाव परिणाम पर निर्णायक प्रभाव डालती है। आरक्षण के बाद यह सीट मुख्य रूप से राजद और जदयू के बीच वर्चस्व की लड़ाई बन गई है। राजद जहां अपने परंपरागत MY आधार और दलित समर्थन से जीत सुनिश्चित करने की कोशिश में है, वहीं जदयू एनडीए गठबंधन के अन्य सामाजिक वर्गों के वोटों पर निर्भर करेगी।
जमीन पर बड़े मुद्दे: स्वास्थ्य और शिक्षा
भले ही मसौढ़ी राजनीतिक रूप से मजबूत गढ़ हो, लेकिन जमीन पर लोगों की चुनौतियां कम नहीं हैं।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था: मसौढ़ी मुख्य रूप से पुनपुन नदी के किनारे बसा एक कृषि आधारित क्षेत्र है।
स्वास्थ्य की कमी: यहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, लेकिन विशेषज्ञ अस्पतालों की भारी कमी है, जिससे गंभीर बीमारियों के लिए लोगों को पटना की ओर रुख करना पड़ता है।
शिक्षा की चुनौती: हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बहुत कम है, जिसके कारण अभिभावक बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए शहरों की ओर भेजने को मजबूर हैं। ये अनसुलझे मुद्दे ही इस चुनाव में मुख्य चर्चा का विषय बनेंगे।
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मसौढ़ी का चुनावी परिणाम यह तय करेगा कि क्या राजद अपना मजबूत राजनीतिक वर्चस्व कायम रखती है या जदयू इस किले में सेंध लगाने में सफल होती है।
