ईरान से टकराव, प्रवासी विवाद और टैरिफ नीति बनी ट्रंप की मुश्किल, अमेरिकी जनता में बढ़ी नाराजगी
महंगाई और आर्थिक दबाव से घिरे ट्रंप, रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ क्यों बढ़ा जनता का आक्रोश?
अमेरिका के चुनावी नतीजों का दुनिया पर असर, भारत से व्यापार समझौते और पश्चिम एशिया की राजनीति पर क्या होगा प्रभाव?
US Midterm Election Impact on World: जब भी दुनिया के तानाशाह शासकों की बात होगी तो ट्रंप को सबसे पहले याद किया जाएगा। बिना सोचे किसी भी फैसले को ले लेना। अपने मनमाने फैसले से देश-दुनिया के लिए मुसीबत पैदा करना।
किसी देश पर मनमाना आधिपत्य थोपना और व्यापार जैसे मुद्दे पर हुकूमत जैसे कदम उठाना ट्रंप का एकाधिकार क्षेत्र है। मौजूदा समय में वैश्विक उथल-पुथल, अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति, बढ़ती महंगाई का बोझ और विश्व युद्ध जैसे हालात का होना इस सब कारणों के जब भी एक किसी प्रमुख कारण की बात होगी तो ट्रंप का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। वैसे ही जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के सालों बाद भी तानाशाह के रूप में हिटलर का नाम जुबा पर आ जाता है।
अमेरिका में घटित किसी भी घटना का प्रभाव समूचे विश्व पर देखने को मिलता है। विश्व की अर्थव्यवस्था, महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी जैसे तमाम मुद्दों पर अमेरिका का सीधा प्रभाव देखने को मिलता है। अमेरिका में हुए मध्यवर्ती चुनाव में ट्रंप की करारी हार होती हुई दिख रही है। मध्यवर्ती चुनाव के परिणाम आगामी होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की दिशा-दशा तय करेंगे।
अब सरकार को अपने कई फैसलों पर विपक्ष के सवालों और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक व्यापार और पश्चिम एशिया की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
अबतक जारी रूझानों पर नजर डांले तो ट्रंम की पार्टी रिपब्लिकन, अमेरिका के दोनों सदनों में पिछड़ती हुई दिख रही है। ट्रंप का चुनाव में हारने का प्रमुख कारण, ईरान से टकराव, प्रवासियों को लेकर मतभेद, SIR प्रक्रिया को लागू करने की पहल और टैरिफ और महंगाई के मुद्दे पर जनता में आक्रोश का परिणाम।
क्या कारण रहा? ट्रंप की लोकप्रियता में अचानक से कमी और जनता के बीच विश्वास का घटना प्रमुख कारणों के रूप में देखा जा सकता है। किन प्रमुख कारणों से ट्रंप की फजीहत हुई सभी तथ्यों को विस्तार से यहां समझने का प्रयास करिएगा।
ट्रंप की पार्टी की हार के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को माना जा रहा है। महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों को प्रभावित किया। ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने का वादा किया था, लेकिन आम जनता को इसका अपेक्षित फायदा महसूस नहीं हुआ।
इसके अलावा ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव ने भी ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ाईं। संघर्ष के कारण ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और तेल की कीमतों पर दबाव देखने को मिला। अमेरिकी जनता के बीच यह सवाल भी उठा कि देश को विदेशी संघर्षों में कितना पैसा खर्च करना चाहिए।
ट्रंप की टैरिफ नीति भी चुनाव में चर्चा का विषय रही। उन्होंने कई देशों से आने वाले सामान पर आयात शुल्क बढ़ाकर अमेरिकी उद्योगों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, इसका असर अमेरिकी बाजार में सामान की कीमतों पर भी पड़ा। आयात महंगा होने से कारोबारियों और उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ीं।
अमेरिका दुनिया की प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्तियों में शामिल है। ऐसे में वहां सत्ता के राजनीतिक समीकरण बदलने का असर दूसरे देशों पर भी पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, इस चुनाव में ट्रंप राष्ट्रपति पद नहीं हारे हैं, बल्कि उनकी रिपब्लिकन पार्टी को संसद में बहुमत गंवाना पड़ा है।
अब डेमोक्रेटिक पार्टी को संसद के दोनों सदनों में बहुमत मिलने से ट्रंप प्रशासन के लिए नए कानून पारित कराना और बजट से जुड़े फैसले लेना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विपक्षी सांसद सरकार की नीतियों की जांच और उनके फैसलों पर जवाबदेही की मांग भी कर सकते हैं।
चीन और रूस के साथ अमेरिका के संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है। चीन के साथ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रूस के साथ यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर संसद में अधिक बहस होने की संभावना है। इससे अमेरिकी विदेश नीति से जुड़े फैसलों में राजनीतिक खींचतान बढ़ सकती है।
ट्रंप की चुनावी हार के बाद सबसे ज्यादा चर्चा ईरान के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर हो रही है। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अमेरिकी राजनीति को प्रभावित किया है। अब संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत होने से ट्रंप प्रशासन पर इस संघर्ष को लेकर जवाबदेही का दबाव बढ़ सकता है।
डेमोक्रेटिक सांसद सरकार से सैन्य कार्रवाई के उद्देश्य, उस पर होने वाले खर्च और उसके परिणामों को लेकर सवाल कर सकते हैं। इसके साथ ही ईरान के साथ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की मांग भी उठ सकती है।
ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने दो रास्ते होंगे। पहला, ईरान पर आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए रखना और दूसरा, कूटनीतिक बातचीत के जरिए किसी समझौते तक पहुंचने की कोशिश करना।
इजरायल अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी है। दोनों देशों के बीच रक्षा, सैन्य तकनीक और खुफिया जानकारी को लेकर मजबूत सहयोग रहा है। ट्रंप प्रशासन ने भी इजरायल को समर्थन दिया है।
हालांकि, अमेरिकी राजनीति में इजरायल को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर अलग-अलग विचार हैं। पार्टी के कुछ नेता इजरायल की सुरक्षा का समर्थन करते हैं, जबकि कुछ नेता गाजा और ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों को लेकर अमेरिकी सहायता की शर्तों पर सवाल उठाते रहे हैं।
अब संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी की मजबूत स्थिति के बाद इजरायल को मिलने वाली सैन्य सहायता और हथियारों की आपूर्ति पर ज्यादा चर्चा हो सकती है। इससे इजरायल पर सैन्य कार्रवाई में संयम बरतने और क्षेत्र में कूटनीतिक समाधान तलाशने का दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका में ट्रंप की पार्टी की हार का असर भारत के साथ व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। दोनों देशों के बीच टैरिफ, कृषि उत्पाद, औद्योगिक सामान और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगाया था। इससे अमेरिका में भारतीय सामान की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई। हालांकि, फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच बने व्यापारिक ढांचे के तहत भारतीय उत्पादों पर दंडात्मक टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया था।
अब अमेरिकी संसद में विपक्ष की मजबूत स्थिति के कारण ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं। भारत को उम्मीद हो सकती है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत में अधिक स्थिरता आएगी और टैरिफ से जुड़ी समस्याओं का समाधान निकलेगा।
भारत के लिए टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी, कृषि और ऊर्जा जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। यदि व्यापारिक समझौते में बेहतर शर्तों पर सहमति बनती है तो भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में फायदा मिल सकता है। हालांकि, रूस से भारत के तेल आयात और कृषि बाजार से जुड़े मुद्दे बातचीत में चुनौती बने रह सकते हैं।
भारत और अमेरिका के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, अंतरिक्ष और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर भी सहयोग है। ऐसे में अमेरिका की घरेलू राजनीति में बदलाव का असर इन क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना होगा। खासकर रूस से तेल खरीद, ईरान के साथ संबंध और व्यापारिक समझौते जैसे मुद्दों पर भारत को संतुलन बनाकर चलना होगा।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की स्थिति में भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से देश में महंगाई और परिवहन लागत पर दबाव पड़ सकता है। वहीं, यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से तनाव कम होता है तो भारत को ऊर्जा और व्यापार के मोर्चे पर राहत मिल सकती है।
ट्रंप की पार्टी की हार ने अमेरिकी राजनीति में विपक्ष की भूमिका को मजबूत कर दिया है। अब आने वाले दो वर्षों में ट्रंप प्रशासन को संसद में कई फैसलों पर विरोध का सामना करना पड़ सकता है। ईरान और इजरायल को लेकर अमेरिकी रणनीति, चीन के साथ व्यापारिक संबंध और भारत के साथ टैरिफ समझौता ऐसे मुद्दे होंगे जिन पर दुनिया की नजर रहेगी।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ट्रंप अपनी विदेश और व्यापार नीति में पूरी तरह बदलाव करेंगे। राष्ट्रपति के पास कई महत्वपूर्ण कार्यकारी अधिकार बने हुए हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप विपक्ष के दबाव में अपनी नीतियों में बदलाव करते हैं या पुराने रुख पर कायम रहते हैं।