Nepal Flood Compensation: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भारत, चीन और अमेरिका से देश में बाढ़ के लिए हर्जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि नेपाल में आई बाढ़ सामान्य नहीं है, बल्कि यह जलवायु प्रदूषण का नतीजा है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है, जबकि नेपाल का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान केवल करीब 0.05 प्रतिशत है।
नेपाल में अचानक आई बाढ़ से अब तक 1,250 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि करीब 5,000 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ से इस समय नेपाल के करीब आठ जिले बुरी तरह से प्रभावित हैं। राहत-बचाव अभियान में नेपाली सेना और पुलिस के हजारों जवान काम कर रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने 31 अगस्त को नेपाली न्यूज चैनल कांतिपुर न्यूज से बात करते हुए कहा कि कूटनीतिक तौर पर देश का रुख अब 'मदद' मांगने से बदलकर 'न्याय और मुआवजे की मांग करने की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन लगभग ना के बराबर होता है। फिर भी, हम एक ऐसे वैश्विक संकट की कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया है।
शिशिर खनाल ने कहा कि दुनिया के बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों में चीन, अमेरिका और भारत शामिल हैं। चीन का वैश्विक उत्सर्जन में हिस्सा करीब 31.84 प्रतिशत, अमेरिका का 12.71 प्रतिशत और भारत का 8.27 प्रतिशत बताया जाता है। ऐसे में नेपाल जैसे कमजोर देशों को मुआवजा देने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।
नेपाली विदेश मंत्री ने देश में आई बाढ़ को सामान्य मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, यह जलवायु प्रदूषण का नतीजा है। जिसके चलते तिब्बत में हिमस्खलन हुआ और नेपाल में इतनी भीषण बाढ़ आई। उन्होंने कहा कि नोआकोट जैसे इलाकों में पानी और मलबे की लहरें 20 से 30 मीटर तक ऊंची थीं। इनकी रफ्तार करीब 180 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई। इतनी तेज गति से आए पानी और मलबे ने घरों, स्कूलों, सड़कों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।
नेपाल का तर्क है कि, नेपाल के मुकाबले चीन का सालाना कार्बन उत्सर्जन लगभग 650 गुना, अमेरिका का 260 गुना और भारत का 170 गुना ज्यादा है। हालांकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की तस्वीर कुछ अलग है। भारत में प्रति व्यक्ति करीब 3 टन, चीन में 11 टन और अमेरिका में 17 टन कार्बन उत्सर्जन होता है।
नेपाल का कहना है कि जिन देशों ने लंबे समय तक कोयले, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से आर्थिक विकास किया है, उनकी जिम्मेदारी भी अधिक होनी चाहिए। इसलिए नेपाल इसे केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि जलवायु संकट से जुड़ा नुकसान मानता है।
जानकारी के मुताबिक, नेपाल ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल के प्रधानमंत्री बालन शाह 8 सितंबर को न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की 81वीं महासभा में इस मुद्दे को उठा सकते हैं।
इसके अलावा नेपाल ने फंड फॉर रिस्पोंडिंग टू लॉस एंड डैमेज (FRLD) से आर्थिक सहायता मांगी है। यह फंड 2022 में मिस्र में हुए COP27 सम्मेलन में उन विकासशील देशों की मदद के लिए बनाया गया था, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण भारी नुकसान हो रहा है।
हालांकि, इस फंड में अब तक अमीर देशों की ओर से बहुत कम धन जमा हुआ है। बताया गया है कि करीब 800 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया है, जबकि नेपाल सहित 119 देशों ने लगभग 2.8 बिलियन डॉलर की मांग की है।
नेपाल सरकार के अनुसार, मौजूदा बाढ़ और भूस्खलन से देश को करीब 5 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। यह उसकी जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत है। इसके मुकाबले FRLD से नेपाल को करीब 20 मिलियन डॉलर मिलने का अनुमान है। इतनी छोटी राशि से नुकसान की भरपाई करना मुश्किल होगा। ऐसे में नेपाल को विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से कर्ज लेना पड़ सकता है। लेकिन अगर यह कर्ज ऊंची ब्याज दर पर मिला, तो इससे नेपाल की आर्थिक समस्या और बढ़ सकती है।
नेपाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि इस आपदा का सीधा संबंध मानव गतिविधियों से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन से है। 26 अगस्त को लांगतांग क्षेत्र में ग्लेशियर के धंसने की घटना को शुरुआत में 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़ा गया था। बाद के वैज्ञानिक अध्ययन में संकेत मिले कि ग्लेशियर के गिरने से पैदा हुई हलचल के कारण भूकंपीय तरंगें रिकॉर्ड हुई थीं।
हालांकि, किसी खास देश को इस आपदा के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराना बहुत मुश्किल है। नेपाल को यह साबित करना होगा कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने इस घटना को किस हद तक प्रभावित किया और किस देश की गतिविधियों का इसमें कितना योगदान था।